
कृष्ण जन्म से कंस वध तक
आई आँधी, बादल बरसे,
अंधकार विकराल,
कारागार में अत्याचारी कंस का,
प्रकट हो गया काल।
पर काल (समय) नहीं आया था अभी,
विपदा थी अति भारी,
कृष्ण अभी बालक ही थे,
और कंस बड़ा था अत्याचारी। वासुदेव ने !बालक कृष्ण को,
गोकुल पहुँचाने की अब कर ली थी तैयारी,
नियति ने रचा खेल अनोखा,
सो गए पहरेदार।
कारागार के द्वार खुल गए,
हो गया था चमत्कार,
वसुदेव-देवकी ने बाबा नंद को,
सौंप दिया था अपना लाल। अनभिज्ञ यशोदा के यही लाल,
बन गए गोकुल के गोपाल।
ग्वालों संग गायों को चरवाया,
चुपके-चुपके माखन भी चुराया।
अपनी मुरली की मधुर तान पर,
गोपियों संग रास रचाया।
तभी मनमोहन के देवकीनंदन होने का,
कंस को हो गया था भान।
मामा के अत्याचार की आँधी,
आ पहुँची गोकुल-धाम।
गोपाला ने भी मथुरा की ओर,
कर दिया प्रस्थान।
कृष्ण-चरण रज पाकर,
मथुरा का हो गया उद्धार।
मामा कंस का कन्हाई ने,
कर दिया संहार।
माता-पिता को मुक्त कराया,
पुत्र धर्म का फ़र्ज़ निभाया।
विष्णु के आठवें अवतार ने,
पृथ्वी तक संदेश पहुँचाया—
धर्म की हमेशा जीत है होती,
अधर्मी का होता नाश।
विनाशकारी विनाशक का,
हमेशा होता है विनाश।✍🏻 निधि खत्री