
यूं तो शोरगुल में पूरा शहर डूबा था,
फिर भी एक मधुर सी धुन रह रहकर सुनाई दे रही थी
इन कई हजारों की भीड़ में,
वह शांति यकायक मुझे अपनी ओर खींचे जा रही थी।
ग्राहकों से भरी चमचमाती दुकानों के बीच ,
उसकी बांसुरी कुछ फीकी सी नज़र आ रही थी
जहां एक ओर बाजारूपन अपना विस्तार बढ़ा रहा था,
वहीं ये धुन जैसे मन को असीम शांति दिला रही थी।
सुबह से चहल पहल ने कितना रूप बदल लिया है,
पर उसके कदम अभी भी स्थिर हैं
बाज़ार में इतनी रौनक है,
लेकिन उसकी धुन हल्की सी अधीर है ।
मैं मानो अपनी ही बनाई किसी दुनिया में खोए जा रही थी,
परंतु यह भीड़ मुझे बाजारूपन की ओर धकेल रही थी
मैं सोच ही रही थी की चलो मुरली खरीद ली जाए ,
पर अर्थशास्त्र के सिद्धांतों ने मुझे आवश्यकताओं की पट्टी पढ़ा दी।