पड़ोसन


भोर समय था, मय सा मैं था, आँखों में नींद समाई थी।
घर के आँगन, चुपके चुपके, भानु किरण जब आई थी।
मैं बाहर आया, अँगड़ाई लेता, उसका पहला दीदार हुआ।
मेरे सामने वाले, घर में उस दिन, नई पड़ोसन आई थी।

 

शाम सवेरे, मुस्कान बिखेरे, आँगन में वो आती थी।
धीरे धीरे, मन के तीरे, नवरस पान कराती थी।
दिन में दो पल, दर्शन उसका, आनंद मगन मन करता था।
वो गाती थी, हर्षाती थी, अमृत कंठ लगाती थी।

 

मैं समझ गया, दो ही दिन में, दिल में उसकी तस्वीर है अब।
वो शाम मेरी, वो सुबह मेरी, मेरे दिल की वो तासीर है अब।
मजबूर हूँ मैं, पर कहना है, उसको दिल की हर बात मुझे।
वो जिद मेरी, मुस्कान मेरी, वो ही मेरी तकदीर है अब।

 

अगले ही पल, कुछ सच सा कल, कल कल सी हुई कानों में।
पलकें झपकी, बूँदें टपकी, दिल टूटा फिर वीरानों में।
आभास मेरा, विश्वास मेरा, सपने में फिर से क्षीण हुआ।
वो नई पडोसन, मिली नहीं, पर मिलेगी आसमानों में।
 


तारीख: 09.08.2017                                    विवेक सोनी




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