वो एक जिसने राह बनाई

 

 

 

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वो एक जिसने राह बनाई

 

✍️ विजय शर्मा एरी

 

जब खामोशी ने जुबाँ को जकड़ लिया,

और अनकहे शब्द सीने में जलने लगे,

तुमने एक खिड़की खोली उजली,

और कहा— लिखो, इससे मन हल्के होंगे।

 

 

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जब रातें लंबी थीं और शब्द खो गए थे,

जैसे पंछी घोंसले से उड़ने से डरे,

तुमने साहस के बीज बो दिए भीतर,

और कहा— उड़ान परीक्षा से ही भरे।

 

मैंने स्याही को तब तक न पहचाना,

जब तक तुमने न दिखाया उसकी धारा,

जहाँ हर घाव और हर चोट छुपाए थे,

हज़ार कहानियों का सहारा।

 

 

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जब मेरी ताक़त टूटकर गिर जाती,

तुमने अपना संबल मेरे भीतर डाला,

टूटे हुए गीतों को भी तुमने समेटा,

और सिखाया— कमज़ोरी भी है शक्ति का प्याला।

 

काँपते हाथों पर हँसे नहीं कभी,

जो लिखने से पहले ही थक जाते थे,

बल्कि तुमने कलम थमा दी उनमें,

और कहा— क्रांति शब्दों से जग जाते हैं।

 

 

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दुनिया ने सपनों को बुझता अंगारा कहा,

उनकी चमक को बेकार बतलाया,

पर तुमने अँधेरों में दीया जलाया,

और राख से भी आग जगाया।

 

तुम रहे पीछे, बिना किसी स्वार्थ,

एक मौन शक्ति, एक सच्चा सहारा,

जब मेरी आवाज़ टूटकर बिखरती,

तो तुम्हारा ही विश्वास बना सहारा।

 

 

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अब हर पंक्ति जो मैं लिखता हूँ,

उसमें तुम्हारी परछाई झलकती है,

तुम्हारे भरोसे की लय गूँजती है,

जैसे भोर की किरण चमकती है।

 

अगर तुम्हारा उपहार न होता,

तो ये कवि शायद जन्म ही न लेता,

तुमने आसमान दिया, पंख दिए,

और वो गीत आज़ाद किए जो किसी ने न सुने थे।

 

 

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तो अगर मेरी कविताएँ किसी दिल को छू जाएँ,

या किसी आँख में चिंगारी जगाएँ,

तो बस इसलिए कि तुमने राह बनाई,

और सिखाया कि आत्मा कैसे उड़ान पाए।

 

हाँ, तुम ही हो मेरी नसों की स्याही,

तुम ही हो वो हवा जो वीणा को छेड़े,

वो एक जिसने राह बनाई—

ताकि मैं लिखते-लिखते ज़िंदा रहूँ, यही मेरी चाहत है।

 


तारीख: 26.09.2025                                    विजय शर्मा ऐरी




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