इस खिले हुए गुलशन का

इस खिले हुए गुलशन का बागवान था तू
मेरे होंठों की मुस्कराहट ,मेरे दिल की धड़कन की लगाम था तू
ये होती थी धीमी या तेज़ तेरे इशारे पे
तेरी हँसी ठिठोलियाँ, तेरी शरारतें, तेरी फ़िक्र 
तेरा वो मुझे अपने किस्से सुनाना 

आज भी वो यादें बिखेर जाती हैं एक फीकी सी हँसी मेरे चेहरे पे
मेरी जुबां जाने क्यों बेलगाम हो जाती थी तेरी मौजूदगी में
पर दिल सिर्फ तुझसे गुफ्तगू करना चाहता था
ऑंखें जाने क्यों हर वक़्त तुझे तलाशती
और तेरे मिल जाने पर तुझ पर ही टिक जाती

आज सब हैं यहाँ बस तेरी कमी है
पर तेरे बिना तो ये सब कुछ भी नहीं है 
कैसे समझाऊँ इस नादान दिल को जो तड़प रहा है और तड़पा रहा है
शायद ही कभी मैं मिल पाऊँ तुझे
पर मेरे होशो हवास तुझ पे निछावर है
मेरा दिल आज भी तुझ पे मरता जा रहा है
 


तारीख: 21.06.2017                                                        शाम्भवी मिश्रा






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