कैसे रिश्तों को बुनते हैं?

बुनकर से भी सीख न पाया, कैसे रिश्तों को बुनते हैं।
जिस धागे में सब बिंध जाएँ, कैसे वह धागा चुनते हैं।।

अपने सपनों की बगिया में, हमने जिनके फूल खिलाए।
उन आशाओं ने जीवन के, पथ में लाखों शूल बिछाए।।
पर हम हैं, जो शूलों से भी, कोमलता-मृदुता चुनते हैं।
जिस धागे में सब बिंध जाएँ, कैसे वह धागा चुनते हैं।।

हमते अब तक जो कहते थे, तुम बिन जीवन सूना मेरा।
तेरे प्यार की जोत न हो तो, जीवन में हो गहन अँधेरा।।
अब तो सदियाँ बीत चुकी हैं, कहाँ ये बातें अब सुनते हैं।
जिस धागे में सब बिंध जाएँ, कैसे वह धागा चुनते हैं।।

दर्पण भी हँसता है हम पर, छाया भी छिप-छिप जाती है।
सुख का सूर्य अस्त जब हो तो, परछाईं भी बढ़ जाती है।।
इक-इक कर अनुबंध टूटते, चुन-चुनकर सपने छिनते हैं।
जिस धागे में सब बिंध जाएँ, कैसे वह धागा चुनते हैं।।

टूट गये सब रिश्ते नाते, कौन है अपना कौन पराया।
जिसके संग मन-डोर बँधी थी, उसने हमको खूब रूलाया।।
अब तो बस रातें बाकी हैं, जगते हैं, तारे गिनते हैं।
जिस धागे में सब बिंध जाएँ, कैसे वह धागा चुनते हैं।।


तारीख: 14.06.2017                                                        डॉ. लवलेश दत्त






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है