
लोगों को बनना होगा, बहुत कुछ, सब कुछ।
यहाँ जाना होगा, वहाँ पहुँचना होगा।
लेकिन कहीं कोई नहीं पहुँच पा रहा।
पहुंचने के लिए जाना पड़ता है, जाने के लिए निकलना पड़ता है — खुद के साथ, अपने पंखों के साथ।
पंख वालों की दुनिया अलग है, दुनियादरों की दुनिया अलग।
वो पहुँचने के लिए उड़ते हैं और जाने के लिए निकल पड़ते हैं।
कोई समय, कोई सरहद उनके लिए नहीं; अगर होती, तो अपने पंखों से दरकिनार कर देते।
साथ में निकलते हैं, साथ में पहुँचते हैं।
रह जाते हैं तो बस हम — समय की वजह से, सरहद की वजह से, या रह जाते है पंखों की वजह से।
मैं चाहती हूँ कि एक दिन हम सब परिंदे बन जाएँ और पहुँचने के लिए निकल जाएँ।