आट्टम

70वाँ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – 2022 की सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म

 

कॉलेज में नाटक मंडली का हिस्सा होने के दौरान मैंने मंच पर कदम रखते वक्त जितना उत्साह महसूस किया, पर्दे के पीछे उतना ही तनाव भी देखा—कलाकारों की ईगो, असहमति, और परस्पर विश्वास का इम्तहान। फिल्म ‘आट्टम’ में वही माहौल फिर उभर आया, लेकिन यहां मंच के पीछे छिपा एक झकझोर देने वाला राज था जिसने सबको कटघरे में खड़ा कर दिया।

 

कहानी और विषयवस्तु:


मलयालम फिल्म ‘आट्टम’ (जिसका अर्थ है ‘द प्ले’) एक प्रोफेशनल थिएटर समूह ‘अरंगु’ के इर्द गिर्द घूमती है। इसमें 12 पुरुष कलाकार हैं और एकमात्र महिला अभिनेत्री अंजली है। एक पार्टी के बाद अगले दिन अंजली आरोप लगाती है कि पार्टी के दौरान उसके साथ किसी ने यौन उत्पीड़न किया। पूरा समूह स्तब्ध रह जाता है।


निर्देशक आनंद एकारशी ने कहानी को एक कमरे में सीमित रखा है, जहां सभी पुरुष इकट्ठे होकर सच का सामना करने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग अंजली की बात पर विश्वास करते हैं, कुछ इसे नशे में हुई गलतफहमी बताते हैं, और कुछ अपनी स्थिति को बचाने में लगे हैं। बहस के दौरान उनके भीतर छिपी लैंगिक पूर्वाग्रह, जातिगत अहंकार और सत्ता भ्रम सामने आते हैं। फिल्म अपराधी की पहचान को स्पष्ट रूप से बताने के बजाय पुरुषों की मानसिकता का खोल उघाड़ती है। यह ‘12 Angry Men’ का स्मरण कराती है, लेकिन पूरी तरह भारतीय संदर्भ में।

 

निर्देशन और अभिनय:


आनंद एकारशी का निर्देशन कसा हुआ है। पूरा घटनाक्रम लगभग एक कमरे में घटता है, पर फिर भी कथा में तीव्रता बनी रहती है। उनका स्क्रीनप्ले मौन और ठहराव का इस्तेमाल कर किरदारों की असहजता दिखाता है।


ज़रीन शिहाब ने अंजली की चोट और क्रोध को बेहद संयम के साथ निभाया है। पुरुष कलाकारों की परफॉर्मेंस इतनी वास्तविक है कि आपको लगता है जैसे आप किसी वास्तविक बहस में शामिल हैं। संवादों में रोज़मर्रा की बोलचाल का इस्तेमाल दर्शकों को वातावरण का हिस्सा बना देता है।

 

संगीत और तकनीकी पक्ष:


फिल्म में पारंपरिक अर्थों में संगीत लगभग नहीं के बराबर है; कमरे की खामोशी, सांसों की आवाज़ और ऊंची होती बहस की आवाज़ ही इसकी धड़कन है। कैमरा लंबे शॉट्स में घूमता है, जिससे दर्शक के भीतर तनाव पैदा होता है। महेश भुवनेन्द का संपादन चुस्त है—दृश्य कट लगने से पहले ही आप अपने विचारों में डूब जाते हैं, और फिर अचानक बहस का तीखा मोड़ सामने आता है।

सामाजिक प्रासंगिकता:


‘आट्टम’ #MeToo आंदोलन के बाद समाज में उठे सवालों को मंच पर लाती है। यह दिखाती है कि कैसे प्रगतिशील दिखने वाले कला समुदाय के भीतर भी पितृसत्ता और लैंगिक पूर्वाग्रह गहराई से जड़ें जमाये हुए हैं। फिल्म दर्शकों से uncomfortable सवाल पूछती है—किसे हम तुरंत दोषी मानते हैं? क्या हम पीड़ित की बात सुनने के बजाय उसके चरित्र पर सवाल उठाने लगते हैं?

 

पुरस्कार और उपलब्धियाँ:


फिल्म को 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का गोल्डन कमल मिला। निर्देशक आनंद एकारशी को सर्वश्रेष्ठ मौलिक पटकथा और महेश भुवनेन्द को सर्वश्रेष्ठ संपादक का पुरस्कार भी मिला। फिल्म ने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी प्रशंसा प्राप्त की।

 

रोचक तथ्य:


•  फिल्म लगभग पूरी तरह एक कमरे में 24 घंटों के भीतर घटती है, जिससे इसकी तीव्रता बढ़ती है।
•  इसे ‘12 Angry Men’ और मालयालम नाटक ‘Kattukuthira’ से प्रेरित कहा जाता है, लेकिन संवेदनशीलता पूरी तरह स्थानीय है।
•  निर्देशक आनंद एकारशी स्वयं थिएटर पृष्ठभूमि से हैं, इसलिए उन्होंने पात्रों की बोली और आचरण में真实性 पर जोर दिया।
•  ‘आट्टम’ ने भारतीय फिल्म क्षेत्र में लैंगिक संवेदनशीलता को लेकर नई बहसें छेड़ीं।

 

‘आट्टम’ एक साधारण कथा नहीं है—यह उन असहज सवालों से दो चार कराती है जिनसे अक्सर हम मुंह मोड़ लेते हैं। यह दर्शाती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए पहले हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी।


तारीख: 09.08.2025                                    Filmy Romeo




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