
मैंने कॉलेज में थिएटर ग्रुप का हिस्सा बनने की कोशिश की, लेकिन पहली ही रिहर्सल में भारी डायलॉग्स and समूह के भीतर राजनीति देखकर पीछे हट गया। कला जगत में प्रतिस्पर्धा and ईगो किस तरह एक-दूसरे से उलझते हैं, यह मैंने अक्सर सुना था। मलयालम फिल्म Aattam देखते समय मुझे वही अनुभव फिर याद आया – यह फिल्म एक थिएटर ग्रुप की कहानी है, जिसमें मंच के पीछे के तनाव को सामने लाया गया है।
निर्द director आनंद एकर्षी की Aattam (हिंदी में ‘नाटक’ या ‘खेल’) के शुरू में ही एक थिएटर समूह ‘अभिनयम’ के कलाकार मंच पर एक खेल खेलते हैं, जिसमें वे विभिन्न सामाजिक वर्गों के पात्रों को निभाते हैं – जैसे ट्रैफिक पुलिस, एम्बुलेंस चालक, बेरोजगार युवा. यह शुरुआती दृश्य इशारा करता है कि हर कलाकार के पास दो चेहरे हैं – एक मंच का and एक असली जीवन का। नाटक की भूमिका में विनय (विनय फोर्ट) director है, जो अपने साथी अभिनेता हरी से ईर्ष्या करता है क्योंकि दर्शक उसे ज्यादा पसंद करते हैं। दल की एकमात्र महिला कलाकार अंजली (जरिन शिहाब) हरी की प्रेमिका है。
रिहर्सल के दौरान, टीम अगली प्रस्तुति की तैयारी कर रही होती है। बीच में ही अंजली समूह को बताती है कि प्रैक्टिस के बाद एक पार्टी में वह छेड़छाड़ की शिकार हुई। वह सभी पुरुष साथियों से पूछती है कि दोषी कौन था; सभी में हड़कंप मच जाता है क्योंकि उस रात वे सभी शराब के नशे में थे। विनय and अन्य सदस्य घटनाओं को याद करने की कोशिश करते हैं, लेकिन कोई खुलकर गलती स्वीकार नहीं करता। टीम के भीतर ईगो, दोस्ती and लैंगिक पक्षपात की बहस छिड़ जाती है।
पूरी फिल्म ‘रनिंग शॉट’ की तरह चलती है – कुछ दृश्य मंच के पीछे and कुछ मंच पर। जब पुरुष पात्र घटना पर चर्चा करते हैं, तो उनका स्वार्थ सामने आता है। कोई मानता है कि अंजली ने भ्रम पैदा किया है, कोई कहता है कि टीम की प्रतिष्ठा बचाने के लिए मामले को दबा देना चाहिए, जबकि कुछ लोग सही‑गलत के संघर्ष में फंस जाते हैं। अंततः अंजली प्रतिकूल माहौल छोड़ देती है and एक नया नाटक मंडली बना लेती है, जबकि विनय and हरी के बीच प्रतिस्पर्धा कायम रहती है।

आनंद एकर्षी ने फिल्म को थियेटर शैली में शूट किया – लंबी टेक, सीमित लोकेशन and dialog प्रधान दृश्य. विनय फोर्ट ने ईर्ष्यालु director की भूमिका ज्यों की त्यों निभाई। उनके चेहरे पर पसीना, तनाव भरी आंखें, and दूसरों को दबाने की कोशिशें वास्तविक लगती हैं। जरिन शिहाब ने अंजली के रूप में एक दृढ़-चित्त and आत्मसम्मान से भरी महिला का चित्रण किया, जो अंततः अपने सपने को चुनती है न कि समूह की स्वीकृति को. अन्य सह कलाकारों ने भी वास्तविक थिएटर actor होने के नाते स्वाभाविकता बनाए रखी, जिससे film डॉक्यूमेंट्री जैसी लगी।
फिल्म में संगीत बहुत कम है; अधिकतर बैकग्राउंड में धीमी तालवाद्य and सन्नाटा है जो tension बढ़ाता है. कॉर्नर में रखे माइक से रिकॉर्ड की गई dialog की फुसफुसाहट नाटक के पर्दे के पीछे के रहस्यों को दर्शाती है. कैमरा मूवमेंट heavy नहीं है; छोटे-छोटे कमरे, तंग गलियां, and थिएटर हाल का दृश्य film की सीमित दुनिया को दिखाता है।
Aattam लैंगिक असमानता and कला जगत में नारी सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विचार करती है। अंजली अकेली महिला कलाकार होने के नाते साथी पुरुषों के ईगो and गलत मान्यताओं का सामना करती है। फिल्म यह दिखाती है कि जिस मंच पर कलाकार इंसानियत का संदेश देते हैं, उसी मंच के पीछे महिलाओं को असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह समूह की सामूहिक जिम्मेदारी and व्यक्तिगत दोष दोनों पर सवाल उठाती है। केरल के पारंपरिक नाटकों में पुरुषों का वर्चस्व and महिलाओं की सीमित भूमिका पर film प्रकाश डालती है।
फिल्म ने 70वें राष्ट्रीय film पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर film का पुरस्कार हासिल किया, जबकि अंतरराष्ट्रीय film समारोहों में भी इसे प्रशंसा मिली। भारतीय दर्शकों and critics ने इसके साहसिक विषयवस्तु, सरल निष्पादन and सामाजिक संदेश की सराहना की।
फिल्म loosely इंस्पायर्ड है अमेरिकी क्लासिक ‘ट्वेल्व एंग्री मेन’ से, जिसमें दोषी की पहचान करने के लिए बारह न्यायाधीश बहस करते हैं। लेकिन Aattam ने इसे लिंग राजनीति के संदर्भ में ढाला। सुश्रुत की कहानी के अनुसार, सेट पर मौजूद कलाकारों ने कई दिनों तक थिएटर वर्कशॉप में हिस्सा लिया ताकि कैमरा आने पर उनकी सहजता बनी रहे।