
बचपन में गांव में जब भी मेले लगते, ढोल की थाप और गरबा की ताल खुद ब खुद पैरों को थिरकने पर मजबूर कर देती थी। दादा हमेशा कहते थे, “संगीत और नृत्य हमारे समाज की आत्मा है।” लेकिन मैंने देखा कि परिवार की महिलाओं को अक्सर मेले नाच गाने से दूर रखा जाता था। वर्षों बाद जब मैंने ‘हेल्लारो’ देखी तो लगा जैसे किसी ने उस पुराने दर्द को आवाज़ दे दी। कच्छ के रण की सूखी खुशबू, अनदेखी महिलाओं का दर्द और ढोल की आवाज़ मेरे बचपन के अधूरे गरबा को फिर से जी उठा।
फिल्म 1975 के गुजरात के एक सूखे और रूढ़िवादी गांव में घटित होती है, जहां वर्षों से बारिश नहीं हुई। ग्रामीणों का मानना है कि देवी नाराज़ हैं क्योंकि एक विधवा ने गरबा खेला था; अब महिलाओं पर गरबा खेलने की पाबंदी है। इस गांव में मंजरी नामक युवा लड़की की शादी होती है। यहां महिलाओं को केवल रोज़ाना सुबह दूर स्थित झील से पानी लाने की अनुमति है; वही पल उनका अपना समय है। एक दिन पानी ले जाते हुए वे रास्ते में एक बेहोश ढोल वादक मुलजी को देखते हैं और उसकी मदद करती हैं। बदले में वह ढोल बजाता है और पहली बार ये महिलाएँ खुले में गरबा खेलती हैं। यह क्षण उनके भीतर छुपी आज़ादी का विस्फोट है।
धीरे धीरे यह गुप्त गरबा उनकी दिनचर्या बन जाता है; पर पुरुषों की दुनिया अलग है। रात में मुलजी गांव के पुरुषों के लिए ढोल बजाता है और दिन में महिलाओं के लिए। आखिरकार महिलाएँ पकड़ी जाती हैं और पुरुष उन पर हाथ उठाते हैं। लेकिन उसी रात महिलाएँ निडर होकर गांव की चौपाल पर गरबा खेलने लगती हैं—और आश्चर्यजनक रूप से वर्षों बाद बारिश होती है। कहानी का यह मोड़ पौराणिकता और नारी सशक्तिकरण को जोड़ता है, जैसे प्रकृति भी उनकी आज़ादी का जश्न मनाती हो।
अभिषेक शाह का निर्देशन उन्हें नये जमाने के संवेदनशील फिल्मकारों की कतार में खड़ा करता है। उन्होंने कच्छ की लोककथा और महिलाओं के दमन को बेहद सजीव तरीके से पर्दे पर उतारा है। संवादों में स्थानीय बोली, मिट्टी के घरों की माटी, रेत के धोरे और कारीगरी इतनी प्रामाणिक है कि दर्शक खुद को उसी गांव में महसूस करता है।
श्रद्धा डांगर ने मंजरी के रूप में भोली लेकिन जिद्दी युवती को संजीदगी से निभाया है—उसकी आंखों का दुख और ढोल की थाप पर खिली मुस्कान लंबे समय तक याद रहती है। जयेश मोरे का ‘मुलजी’ कम संवादों में भी अपनी आंखों और ढोल की थाप से बहुत कुछ कह जाता है। बाकी महिला कलाकार—नीलम पांचाल, ब्रिंदा त्रिवेदी, तेजल पंचसारा आदि—ने गांव की महिलाओं के बीच आपसी हँसी मजाक, डर और विद्रोह को जीवंत किया है।

मेहुल सुरती की धुनें इस फिल्म की आत्मा हैं। पारंपरिक गुजराती लोकसंगीत और आधुनिक रागों का मिश्रण अद्भुत है। ‘हैय्या’ और ‘वाग्यो रे ढोल’ जैसे गीत गरबा की ऊर्जा को परदे पर उतारते हैं। ढोल की थाप, मंजीरों की खनक और समूह गायन इतना जीवंत है कि दर्शक खुद भी उठकर नाचना चाहता है। सौरभ जोशी के लिखे गीत महिला चेतना और आज़ादी की आवाज़ हैं।
‘हेल्लारो’ सिर्फ नृत्य नहीं, नारी मुक्ति का उत्सव है। यह दिखाती है कि कैसे पारंपरिक मान्यताएँ अक्सर महिलाओं को दबाती हैं और कैसे सामूहिक साहस से व्यवस्था बदल सकती है। 1970 के दशक में बसा कथानक होने पर भी कहानी आज उतनी ही प्रासंगिक है—कई समाजों में महिलाएँ अब भी पितृसत्ता की बेड़ियों में जकड़ी हैं। फिल्म का संदेश है कि अगर महिलाएँ एकजुट होकर खड़ी हों तो परिवर्तन संभव है।
फिल्म ने 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का गोल्डन कमल जीता—यह गुजराती सिनेमा के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि रही। इंडियन पैनोरमा में इसे उद्घाटन फिल्म का सम्मान मिला, और समीक्षकों से लेकर आम दर्शकों तक सभी ने इसकी कहानी, सिनेमेटोग्राफी, अभिनय और संगीत की सराहना की। कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी इसे दिखाया गया।
• निर्देशक अभिषेक शाह ने बताया कि कहानी कच्छ के एक गांव की लोककथा और वास्तविक पितृसत्तात्मक घटनाओं से प्रेरित है।
• फिल्म के लिए कच्छ के रण में एक पूरा गांव—भुंगों (मिट्टी के घरों), चौपाल और मंदिर सहित—निर्मित किया गया था।
• अधिकांश कलाकार थिएटर पृष्ठभूमि से आते हैं, जिससे अभिनय में स्वाभाविकता आती है।
• यह पहली गुजराती फिल्म है जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का सम्मान मिला।
‘हेल्लारो’ केवल महिला नृत्य का उत्सव नहीं, बल्कि समाज पर गहरा प्रश्न है: क्या हम अब भी पुरानी पाबंदियों में कैद हैं? फिल्म का अंत केवल बारिश नहीं लाता, बल्कि दर्शकों के मन में बदलाव की बौछार भी लाता है।