कांतारा

लोककथा, पर्यावरण and आध्यात्मिकता का मेल

 

एक बार मैं कर्नाटक के तटीय इलाके में घूम रहा था, तब एक स्थानीय उत्सव ‘भूत कोला’ देखा। लाल कपड़े पहने कलाकार, तीव्र ड्रम की धुन पर नाचते हुए, स्वयं को किसी देवता का माध्यम बताते। उनकी आंखों में अजीब सी चमक and शरीर में अजीब सी शक्ति दिखी। यह अद्भुत अनुभव मन में बस गया। जब ऋषभ शेट्टी की Kantara देखी, तो वह दृश्य फिर जीवंत हो उठा।

 

कहानी and विषयवस्तु


फिल्म की कहानी तीन समय-कालों में बंटी है। 1847 में एक स्थानीय राजा अपने परिवार की बीमारी का समाधान खोजते हुए एक जंगल के देवता ‘पंजुरली’ की भेंट करते हैं। पंजुरली उसे वरदान देता है कि अगर वह अपने लोगों को खुश रखे and जंगल के एक हिस्से को ग्रामवासियों को दान करे, तो उसका राज्य फलता-फूलता रहेगा। देवता चेतावनी देते हैं कि यदि राजा या उसके वंशज कभी उस भूमि को वापस लेने की कोशिश करेंगे, तो वे विनाश का सामना करेंगे। राजा भूमि दान कर देता है and कबीले के लोग देवता की पूजा करना शुरू करते हैं।


1970 के दशक में, राजा का वंशज इस भूमि को वापस लेने की कोशिश करता है। वह दावा करता है कि उसके पूर्वजों द्वारा किया गया दान अवैध था। गांव वाले, जो अब ‘दैववाद’ नामक लोककला and देवपूजा पर निर्भर हैं, इसका विरोध करते हैं। एक दिन जब वंशज भूमि वापस लेने के लिए आता है, तो वह रहस्यमय तरीके से गायब हो जाता है and वापस नहीं आता। यह घटना गांव में किंवदंती बन जाती है।


1990 के दशक में कहानी का मुख्य भाग होता है। यहां शिवा (ऋषभ शेट्टी) नाम का युवक है, जो कंबाला (भैंस दौड़) प्रतियोगिताओं का चैंपियन है। शिवा अपने पिता के हीरो बनने की परंपरा को जारी रखना नहीं चाहता क्योंकि बचपन में उसने पिता को भूत कोला समारोह में दिव्य शक्ति से भरते देखा था, and उसी रात पिता गायब हो गए थे। कहानी में एक वन अधिकारी मुरली (किशोर) आता है, जो जंगल की रक्षा के लिए पेड़ों की अवैध कटाई and पशु शिकार को रोकना चाहता है। शिवा and मुरली के बीच संघर्ष शुरू होता है – शिवा गांववालों की जरूरतों and उनकी भूमि पर अधिकार के लिए लड़ता है, जबकि मुरली कानून का पालन करवाना चाहता है।


कहानी तब मोड़ लेती है जब स्थानीय जमींदार देवेंद्र खेरा (अच्युत कुमार) गांव की भूमि पर कब्जा करना चाहता है and पुरानी दान की गई जमीन पर अपना अधिकार जताता है। वह लोगों को बेवकूफ बनाकर सौदा करवाने की कोशिश करता है। शिवा अपने गांव and देवता की जमीन की रक्षा के लिए उठ खड़ा होता है। फिल्म का अंतिम भाग भूत कोला अनुष्ठान, देवता का वेश and शिवा पर ‘दैव’ के वचन का अवतरण दिखाता है। शिवा देवता की शक्ति से भरकर देवेंद्र को मार देता है and गांव की भूमि वापस दिलाता है। वह महसूस करता है कि उसके पिता ने भी यही जिम्मेदारी उठाई थी and वह अब देवता का अगला सेवक है।

निर्देशन and अभिनय


ऋषभ शेट्टी ने न केवल film का निर्देशन किया, बल्कि मुख्य पात्र शिवा की भूमिका भी निभाई। उन्होंने लोककला, देवपूजा and गांव की संस्कृति को प्रामाणिकता से पेश किया। उनके अभिनय में ग्रामीण व्यक्ति की लापरवाही, विद्रोही स्वभाव and अंत में आध्यात्मिक जगत से जुड़ने की यात्रा निहित है। किशोर ने वन अधिकारी के रूप में मजबूत, कानून के प्रति प्रतिबद्ध किरदार निभाया, जो वन and मानव के संघर्ष का प्रतीक है। अच्युत कुमार ने लालची जमींदार के रूप में अपना कौशल दिखाया।

 

संगीत and दृश्य प्रभाव


अजय‑अतुल के संगीत and बी. अजनेश लोकनाथ के पृष्ठभूमि स्कोर ने film को जीवन्त बना दिया। ड्रम, चेंडे, नादस्वरम जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों ने भूत कोला की आध्यात्मिकता and कंबाला की ऊर्जा को दर्शाया। कैमरा वर्क में पश्चिमी घाटों के घने जंगल, पर्वतीय ढलान and रात को जगमगाते धूपदानों का सुंदर चित्रण है। क्लाइमेक्स में देवता के अधीन शिवा को दिखाने वाले दृश्य cinematic रूप से प्रभावशाली हैं।

 

सामाजिक प्रासंगिकता


Kantara आधुनिक विकास and आदिवासी अधिकारों के संघर्ष पर आधारित है। film दिखाती है कि कैसे कानून बनाते समय जंगल में रहने वाले समुदायों की संस्कृति and श्रद्धा को नजरअंदाज किया जाता है। पंचायत भूमि and कॉर्पोरेट लालच के बीच लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाती है। साथ ही यह film पर्यावरण संरक्षण, देवस्थान प्रथा and मानवीय लालच की आलोचना करती है।

 

पुरस्कार and उपलब्धियाँ


film ने 70वें राष्ट्रीय film पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय film का पुरस्कार जीता and ऋषभ शेट्टी को सर्वश्रेष्ठ actor का सम्मान मिला। इंटरनेशनल film festivals में भी इसे सराहा गया। film बॉक्स ऑफिस पर एक सांस्कृतिक phenomenon बन गई, खासकर कर्नाटक में।

 

रोचक तथ्य


film में दिखाया गया भूत कोला वास्तविक लोक प्रथा से प्रेरित है। ऋषभ शेट्टी ने भूत कोला कलाकारों से प्रशिक्षण लिया ताकि वे मंच पर उसी ऊर्जा and नृत्य को दर्शा सकें। film की सफलता के बाद, कर्नाटक सरकार ने देवता पूजा स्थानों and लोक कलाकारों के संरक्षण के लिए योजनाएं शुरु कीं।


तारीख: 06.08.2025                                    Filmy Romeo




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