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मैंने गुजरात के कच्छ जिले की यात्रा के दौरान कई महिलाओं से मुलाकात की, जिनकी कहानियां मुझे सोचने पर मजबूर करती थीं। वे हाथों में कढ़ाई and सिर पर पानी के मटके लिए रेगिस्तान में दूर-दूर चलती थीं, लेकिन उनकी आवाज़ें अक्सर घर की चारदीवारी तक सिमट जाती थीं। जब मैंने मनीषा पारेख and रत्ना पाठक शाह अभिनीत film Kutch Express के बारे में सुना, तो उम्मीद जगी कि यह film उन अनकही आवाजों को बाहर लाएगी, and ऐसा ही हुआ।
निर्द director विरल शाह की गुजराती film Kutch Express एक छोटे कच्छी गांव की महिलाओं की कहानी है, जो अपनी रचनात्मकता, दोस्ती and आत्मसम्मान की खोज में निकलती हैं. कहानी का प्रारंभ स्थानीय भाषा में एक समूह गान से होता है, जहां महिलाएं रात को अपने घरों से बाहर आकर एक वृत्त में जमा होती हैं and ‘Sisoti’ समूह बनाती हैं – जिसका मतलब है सीटी बजाना। वे अपने पतियों को नींद की गोली देकर बाहर निकलती हैं ताकि किसी को पता न चले कि वे अपनी खुशी खोजने जा रही हैं।
film की प्रमुख पात्र मोंघी (मानसी पारेkh) है, जो ग्रामीण महिला है लेकिन भीतर से कलाकार and फैशन designer है। उसका पति (धर्मेंद्र घनश्याम) उसे ‘कागला’ यानी बेकार कहता है, उसकी कला को महत्व नहीं देता। मों्घी अपनी सास बा (रत्ना पाठक शाह) के साथ रहती है, जो काफी आधुनिक सोच वाली हैं and बहू का उत्साह बढ़ाती हैं। एक दिन मों्घी की मुलाकात film director अभिनव से होती है, जो उसकी कढ़ाई and कपड़ों से प्रभावित होता है। वह मों्घी को शहर में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका देता है। मों्घी ‘Sisoti’ समूह के साथ अपने सपने को आगे बढ़ाती है लेकिन परिवार के पुरुषों के विरोध का सामना करती है।
film में कई छोटी कहानियां भी साथ चलती हैं – एक महिला जो अपना खोया प्यार वापस पाना चाहती है; दूसरी, जो पढ़ना-लिखना सीख कर अपने बच्चों को आगे बढ़ाना चाहती है; and बा, जो समाज के नियमों से ऊपर उठकर बहू के सपने का समर्थन करती हैं. कथा का बड़ा हिस्सा मों्घी के संघर्ष and उसके पति तथा समाज की सोच बदलने की यात्रा पर केंद्रित है। अंततः, एक फैशन शो में मों्घी की design की हुई पोशाकें खूब प्रशंसा पाती हैं and गांव के लोग उसकी क्षमता को पहचानते हैं। film कच्छ की प्राकृतिक सुंदरता, लोक गीतों, and कढ़ाई कला का सुंदर चित्रण करती है।
वiral Shah ने गुजरात की मिट्टी, मिट्टी की गंध and महिलाओं की दुनिया को बड़े प्यार से उभारा है। मानसी पारेkh ने मों्घी के रूप में एक सपनादर्शी महिला का किरदार निभाया है; उनकी आंखों में उम्मीद चमकती है and हाथों की कढ़ाई में दृढ़ता। रत्ना पाठक शाह अपने स्वाभाविक अंदाज में सास का किरदार निभाती हैं, जो बहू को बेटी की तरह स्वीकारती है। अन्य महिला कलाकारों – वन्दना पठान, धृति त्रिवेदी, and राजीव खंडेलवाल – ने भी सशक्त प्रदर्शन दिया।
film का संगीत सचिन‑जिगर ने तैयार किया है, जो कच्छ के लोक गीतों and आधुनिक धुनों का मिश्रण है। ‘Kuk Ada’ जैसे गीत में ढोलक, मंजीरा and कच्छी भाषा की मिठास है। film की सिनेमैटोग्राफी रेगिस्तान के थार, रणोत्सव की रंगीन छावनी and कच्छ की कढ़ाई कला को सुंदरता से कैद करती है।

Kutch Express पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की आत्मनिर्भरता and रचनात्मकता की आवाज़ है। यह film दिखाती है कि कैसे ग्रामीण महिलाओं के सपने भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने पुरुषों के सपने। ‘Sisoti’ समूह रात में सीटी बजाते हुए पुरुषों की dunia में अपने लिए जगह बनाता है। यह नारी सशक्तिकरण and सामुदायिक समर्थन का प्रतीक है। film में सास-बहू के रिश्ते को भी सकारात्मक रूप में दिखाया गया है, जहां बा अपनी बहू का साथ देती हैं – यह हिंदी सिनेमा के पारंपरिक सास बहू संघर्ष से हटकर है।
70वें राष्ट्रीय film पुरस्कारों में Kutch Express ने सर्वश्रेष्ठ फीचर film प्रोमोटिंग नेशनल, सोशल and एनवायरनमेंटल वैल्यूज, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (मानसी पारेkh) and सर्वश्रेष्ठ कॉस्टयूम design के पुरस्कार जीते। गुजराती सिनेमा के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि यह भाषा and संस्कृति के साथ-साथ समकालीन महिला मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाई।
film की शूटिंग कच्छ के गांवों में वास्तविक लोकेशनों पर हुई। इस दौरान क्रू and कलाकारों ने स्थानीय कढ़ाई कलाकारों से प्रशिक्षण लिया। ‘Sisoti’ समूह की प्रेरणा कच्छ की एक सच्ची घटना से ली गई है, जब गांव की महिलाओं ने मिलकर घरेलू हिंसा के खिलाफ विरोध जताया था।