
कॉलेज के दिनों में हम सबने कभी न कभी वह दौर ज़रूर जिया है जब भविष्य धुँधला लगता है, मन किसी दिशा में नहीं टिकता और एक अजीब सी उलझन अंदर चलती रहती है।उसी उलझन की शकल है करण शेरगिल, और उसी की फिल्म है “लक्ष्य”।
जब मैंने “लक्ष्य” देखी, तो यूँ लगा जैसे मेरी ही उलझनों को स्क्रीन पर आकार दे दिया गया हो। और फिर उस पर जो समाधान मिला—वह सिर्फ एक सैनिक की कहानी नहीं थी, वह मेरे जैसे हज़ारों युवाओं का जवाब था।
करण शेरगिल (ऋतिक रोशन) एक दिल्ली का युवक है, जो भले ही पढ़ाई में औसत है लेकिन घर के पैसे पर मौज करता है।
उसे नहीं पता कि उसे ज़िंदगी में क्या करना है—MBA करना है? नौकरी करनी है? या बस यूँही वक़्त काटना है?
एक दिन एक फ़िल्म देखकर उसे “फौजी” बनने का मन करता है और वह बिना सोच-विचार के NDA में दाख़िला ले लेता है।
वहाँ का अनुशासन, फिजिकल ट्रेनिंग और मानसिक दबाव उसे तोड़ देता है और वह भागकर घर वापस आ जाता है।
यहाँ पर उसकी प्रेमिका रोमिला दत्ता (प्रिटी जिंटा) जो एक आत्मनिर्भर, बुद्धिजीवी और पत्रकार है, उससे कहती है—"तुम्हें पता ही नहीं है कि तुम्हें क्या करना है। तुम्हारे पास कोई लक्ष्य नहीं है।"
यही बात करण को झकझोर देती है। और तब शुरू होता है उसका लक्ष्य की ओर सफर—वह दोबारा सेना में लौटता है, कठिन प्रशिक्षण से गुज़रता है और एक अनुशासित, समर्पित फौजी बनकर निकलता है।
फिल्म का दूसरा भाग कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि में है, जहाँ करण एक टुकड़ी का नेतृत्व करता है और एक दुर्गम पहाड़ी पोस्ट पर तिरंगा लहराने के लिए जान की बाज़ी लगाता है।
फरहान अख्तर की यह दूसरी फिल्म थी (पहली थी “दिल चाहता है”) और इस बार उन्होंने दोस्ती और रिश्तों की जगह ज़िम्मेदारी और राष्ट्रभक्ति को केंद्र में रखा।
फिल्म का टोन यथार्थवादी है—कोई बनावटी राष्ट्रवाद नहीं, कोई ज़्यादा ड्रामा नहीं।
यह एक आंतरिक लड़ाई की कहानी है—जहाँ युद्ध मैदान से ज़्यादा, अपने भीतर लड़ा जाता है।
फरहान ने सेना के जीवन को बड़ी सच्चाई और मर्यादा से दिखाया है—न शोर, न चीख, न चमत्कार… बस हौसला।

ऋतिक रोशन के करियर का यह एक मील का पत्थर है।
फिल्म की शुरुआत में उनका खोया-सा, सुस्त युवक वाला अंदाज़ भी असली लगता है और अंत में गम्भीर, अनुशासित सैनिक का रूप भी।
उनके शरीर में आया बदलाव, चेहरा, चाल और नज़रों की दृढ़ता—सब कुछ करण के सफर को विश्वसनीय बनाता है।
प्रिटी जिंटा ने रोमिला के रूप में एक ऐसा किरदार निभाया है जो आज़ाद सोच की प्रतीक है।
वह प्रेमिका है लेकिन रक्षक नहीं—वह प्रेरणा देती है, झकझोरती है, और रास्ता दिखाती है।
अमिताभ बच्चन एक सीनियर ऑफिसर की भूमिका में थोड़े संवादों में ही एक गहराई छोड़ जाते हैं।
“जो ज़िंदगी में कुछ नहीं करता, उसे कुछ नहीं मिलता।”
“तिरंगा लहराना है, हर हाल में।”
“लक्ष्य मिलना नहीं, बनाना पड़ता है।”
ये लाइनें सिर्फ सैनिकों की नहीं, हर युवा की प्रेरणा हैं।
शंकर-एहसान-लॉय का संगीत फिल्म की आत्मा है।
• “Kandhon se milte hain kandhe” – एक शानदार युद्ध गीत जो देशभक्ति को गौरव के साथ प्रस्तुत करता है।
• “Kitni Baatein” – रोमिला और करण के रिश्ते की खामोशियों को बयां करता है।
• “Lakshya – title track” – जोश, जुनून और ध्येय की धड़कन।
सईद क़ादरी के गीतों में विचार हैं, भावना है, और प्रेरणा है।
• मंज़िल खुद नहीं आती, चलकर जाना पड़ता है।
• असफलता से डरकर भागना आसान है, पर लड़कर जीतना सच्ची पहचान है।
• ज़िंदगी में अगर एक “लक्ष्य” तय हो जाए, तो हर चुनौती छोटा लगने लगता है।
यह फिल्म केवल सेना की कहानी नहीं, बल्कि हर उस युवा की कहानी है जो आज “कंफ्यूज” है, पर कल “कमांडर” बन सकता है।
• फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भले ही औसत प्रदर्शन किया हो, लेकिन इसे क्रिटिक्स की भरपूर सराहना मिली।
• बाद के वर्षों में इसे कल्ट क्लासिक का दर्जा दिया गया।
• सेना ने भी इस फिल्म की यथार्थपरक प्रस्तुति की सराहना की।
• ऋतिक को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के कई नॉमिनेशन मिले।
• फिल्म की शूटिंग असली LOC के पास की गई थी—हाड़ कंपाने वाली ठंड में।
• ऋतिक ने सेना की ट्रेनिंग का हिस्सा खुद लिया और महीनों खुद को फिजिकल-मेंटल रूप से तैयार किया।
• प्रिटी जिंटा का लुक और किरदार बार्क चैनल की वरिष्ठ पत्रकार से प्रेरित था।
“लक्ष्य” एक युद्ध फिल्म नहीं, बल्कि 'स्वयं की खोज' की फिल्म है।
यह फिल्म आपको नारा नहीं देती, न देशभक्ति का भाषण… बल्कि यह कहती है—
“खुद को पहचानो, लक्ष्य तय करो… और फिर पीछे मुड़कर मत देखो।”
करण शेरगिल हर उस युवा की आवाज़ है जो कभी खुद को खो बैठा था… लेकिन फिर लक्ष्य ने उसे पा लिया।