रॉकेट्री

द नंबी इफेक्ट (69वाँ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – 2021 की सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म)

 

मैंने स्कूल के दिनों में रॉकेट विज्ञान पर किताबें पढ़ीं और सोचा कि हमारे वैज्ञानिक हमेशा सम्मान और संसाधनों से भरे रहते होंगे। लेकिन ‘रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट’ देखने के बाद पता चला कि वैज्ञानिकों को भी राजनीति, साजिश और बदनामी का सामना करना पड़ सकता है। नंबी नारायणन की कहानी ने मन में एक सवाल पैदा किया: क्या हम अपने विज्ञान नायकों के साथ न्याय कर रहे हैं?

 

कहानी और विषयवस्तु:


यह फिल्म भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिक नंबi नारायणन के जीवन पर आधारित है। नंबी का सफर एक टीवी इंटरव्यू से शुरू होता है जिसमें वे अपने जीवन की कहानी अभिनेता से साझा करते हैं। युवा नंबी थुंबा रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन में काम करते हुए एक दुर्घटना में अब्दुल कलाम को बचाते हैं, फिर सरकार की सहायता से प्रिंसटन विश्वविद्यालय में रॉकेट प्रोपल्शन में अध्ययन करने जाते हैं। वहां उन्हें नासा में नौकरी का आकर्षक प्रस्ताव मिलता है, लेकिन वे अपने देश के लिए लौटना चुनते हैं।


भारत में संसाधनों की कमी के बावजूद वे स्कॉटलैंड से उपकरण लाने और फ्रांस से लिक्विड फ्यूल टेक्नोलॉजी सीखने में सफल रहते हैं। ‘विकास’ इंजन उनके करियर की उपलब्धि है। आगे उनका उद्देश्य भारत को क्रायोजेनिक इंजन दिलाना होता है; इसके लिए वे सोवियत संघ से समझौता करते हैं। लेकिन विदेशी शक्तियां इस सौदे को रोकने की कोशिश करती हैं।


एक दिन नंबी को अचानक जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है। उन्हें भारी यातनाएँ दी जाती हैं, मीडिया उन्हें देशद्रोही बताता है और उनका परिवार सामाजिक बहिष्कार झेलता है। हालांकि सीबीआई जांच में सच सामने आता है कि यह सब भारत के क्रायोजेनिक कार्यक्रम को रोकने की साजिश थी। वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायालय उन्हें निर्दोष घोषित करता है और वे पुनः ISRO में शामिल होते हैं। अंततः उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जाता है।

निर्देशन और अभिनय:


यह अभिनेता आर. माधवन का निर्देशन और लेखन में पहला प्रयास है, जिसमें वे मुख्य भूमिका भी निभाते हैं। उन्होंने नंबी के युवा, मध्य आयु और वृद्ध तीनों रूपों को शानदार ढंग से प्रस्तुत किया। भाषाओं के उच्चारण, शारीरिक हाव भाव और वैज्ञानिक जिज्ञासा को वह बखूबी दिखाते हैं।


फिल्म की संरचना इंटरव्यू फ्रेमवर्क में है, जिससे कहानी फ्लैशबैक के माध्यम से आगे बढ़ती है। कुछ दर्शकों को यह धीमा लग सकता है, लेकिन यह नंबी की जीवन यात्रा को क्रमबद्ध करने में मदद करता है। फ्रांस, रूस और अमेरिका में फिल्माए गये दृश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता दिखाते हैं।

 

संगीत और तकनीकी पक्ष:


सैम सी. एस. का बैकग्राउंड स्कोर वैज्ञानिक नाटक को समर्थन देता है। सिनेमेटोग्राफर सिरशा रे ने प्रयोगशाला, विश्वविद्यालय और यातना कक्ष के दृश्यों को बारीकी से कैप्चर किया। फिल्म का प्रोडक्शन कई देशों में शूटिंग के बावजूद सीमित बजट में हुआ, लेकिन तकनीकी तौर पर यह प्रभावशाली है।

 

सामाजिक प्रासंगिकता:


‘रॉकेट्री’ केवल एक वैज्ञानिक की कहानी नहीं; यह मीडिया ट्रायल, राजनीतिक साजिशों और विदेशी दखल पर तीखा प्रहार है। यह दिखाता है कि झूठे आरोप किसी परिवार को कितने वर्षों तक पीड़ा दे सकते हैं और कैसे एक देश अपने वैज्ञानिकों की कद्र करना भूल सकता है। यह फिल्म वैज्ञानिकों के संघर्ष और न्याय के महत्व पर विमर्श शुरू करती है।

 

पुरस्कार और उपलब्धियाँ:


फिल्म ने 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का सम्मान प्राप्त किया और कान्स फिल्म फेस्टिवल समेत कई अंतरराष्ट्रीय समारोहों में सराहना पाई। यह मध्यम बजट की होने के बावजूद वैश्विक दर्शकों तक पहुंचने में सफल रही।

 

रोचक तथ्य:


•  यह आर. माधवन का निर्देशन में पदार्पण है; उन्होंने लगभग छह वर्षों तक इस पर काम किया।
•  हिंदी संस्करण में शाहरुख खान और तमिल संस्करण में सुरिया ने कैमियो किया।
•  नंबi नारायणन स्वयं फिल्म के तकनीकी सलाहकार थे, जिससे वास्तविक घटनाओं को सटीकता मिली।
•  फिल्म के कई दृश्य प्रिंसटन विश्वविद्यालय, पेरिस और मॉस्को जैसी वास्तविक लोकेशनों पर शूट किए गए।

 

‘रॉकेट्री’ विज्ञान, राजनीति और मानव अधिकारों का संगम है। यह हमें याद दिलाती है कि देश की तरक्की में वैज्ञानिकों का सम्मान और सुरक्षा कितनी जरूरी है, और किसी के योगदान को बदनाम करने वाली साजिशें विकास को किस तरह रोक सकती हैं।
 


तारीख: 08.08.2025                                    Filmy Romeo




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