सोरारई पोटरु

68वाँ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – 2020 की सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म

 

एक बार रेल टिकट खरीदते समय मैंने एक किसान को कहते सुना, “काश हवाई जहाज भी हमारे बस की बात होते, तो मेरा बेटा दो दिन में लौट आता।” यह सुनकर दिल में टीस उठी कि हवाई यात्रा आम आदमी के लिए कितनी दूर की चीज़ है। उसी दौर में जब ‘सोरारई पोटरू’ देखने गया, तो यह सपना फिल्म की कहानी बनकर परदे पर उतरता दिखाई दिया।

 

कहानी और विषयवस्तु:


कहानी शुरू होती है नेदुमारण राजांगम उर्फ ‘मारा’ से, जो भारतीय वायु सेना में सेवा दे चुका है और गरीबों के लिए सस्ती विमान सेवा शुरू करने का सपना देखता है। यह सपना उसके पिता की मौत से जुड़ा है—पिता बीमार थे और मारा पैसे की कमी के कारण समय पर हवाई टिकट नहीं खरीद पाया। यह दर्द उसके भीतर आग की तरह जलता है।


मारा अपने आइडिया के साथ बड़े उद्योगपति पहरेश गोस्वामी के पास जाता है, लेकिन वह उसे ताने मारकर कहता है कि गरीबों को अमीरों के साथ उड़ने की कोई जरूरत नहीं। मारा के लिए यह अपमान प्रेरणा बन जाता है। इसी दौरान वह सुंदरी बोम्मी से मिलता है, जो खुद का बेकरी व्यवसाय शुरू करना चाहती है। दोनों अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते शादी से इनकार करते हैं, मगर दोस्ती और संघर्ष उन्हें करीब लाता है और वे शादी कर लेते हैं।


मारा ‘डेक्कन एयर’ नामक सस्ती एयरलाइन शुरू करने की योजना बनाता है। परंतु उसके रास्ते में सरकार की जटिल नीतियाँ, धन की कमी और प्रतिस्पर्धी कंपनियां आड़े आती हैं। पहरेश गोस्वामी अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उसका विमान सौदा रद्द करवा देता है; यहां तक कि उसका क्रू और निवेशक पीछे हट जाते हैं। मारा टूटता है, लेकिन बोम्मी और गांव वाले उसका मनोबल बढ़ाते हैं। वह छोटे विमानों से शुरुआत करने, दूरदराज़ हवाई पट्टियों का उपयोग करने और रेलवे स्टेशनों पर टिकट बेचने जैसे नए रास्ते खोजता है। धीरे धीरे उसकी मेहनत रंग लाती है—लोग ट्रेन के बजाय हवाई जहाज से यात्रा करने लगते हैं। मारा का सपना साकार होता है और वह बड़े बिजनेस समूह को यह संदेश देता है कि आसमान किसी की जागीर नहीं।

 

निर्देशन और अभिनय:


फिल्म का निर्देशन सुधा कोंगरा ने किया है, जिन्होंने वास्तविक जीवन के ‘एयर डेक्कन’ के संस्थापक कैप्टन जी. आर. गोपीनाथ के संस्मरण ‘सिम्प्ली फ्लाई’ से प्रेरणा ली। वह दर्शक को उद्यमिता, संघर्ष और सामाजिक संदेशों के बीच कहीं भी खोने नहीं देती हैं। उनके निर्देशन में भावनात्मक दृश्यों और तकनीकी पहलुओं का संतुलन है।


सुरिया ने मारा का किरदार इतनी सहजता से निभाया कि उनका दर्द, गुस्सा और जिद दिल में उतर जाते हैं। उनकी आंखों में पिता को खोने का दर्द और गरीबों को उड़ते देखने की इच्छा साफ झलकती है। अपर्णा बालमुरली ने बोम्मी के रूप में स्वावलंबी, व्यावहारिक और प्रेरक महिला का चरित्र गढ़ा; वह मारा का साथ देती है लेकिन अपनी पहचान कायम रखती है। परेश रावल ने पहरेश गोस्वामी को मुस्कराते हुए अहंकारी विलेन के रूप में जीवंत किया है।

 

संगीत और तकनीकी पक्ष:


जी. वी. प्रकाश कुमार का संगीत कहानी में गति और भावनात्मक उछाल लाता है। ‘काथ्थु करुप्पू’, ‘वंदा कुज़ंदई’ और ‘कायिल उयिरो’ जैसे गाने सुनने में मधुर हैं और कहानी में पिरोये गए हैं। सिनेमेटोग्राफर निकेत बोम्मिरेड्डी ने मदुरै के गांवों, हवाई अड्डों और रनवे के दृश्यों को जीवंत बनाया है। फिल्म का संपादन तेज है, जिससे कहानी कहीं भी ठहरी नहीं लगती।

सामाजिक प्रासंगिकता:


‘सोरारई पोटरू’ उद्यमिता, समानता और सामाजिक न्याय का संदेश देती है। फिल्म यह बताती है कि नवाचार और सामाजिक समर्पण के बल पर एक सामान्य व्यक्ति भी असंभव को संभव कर सकता है। मारा का सपना सिर्फ व्यापारिक नहीं बल्कि सामाजिक है—गरीब भी विमान में बैठकर आसमान छू सकें। फिल्म वर्गभेद, सरकारी बाधाओं और पूंजीवादी षड्यंत्रों पर सवाल उठाती है।

 

पुरस्कार और उपलब्धियाँ:


यह फिल्म 68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म सहित पांच प्रमुख पुरस्कार जीतने वाली पहली तमिल फिल्म बनी। सुरिया को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अपर्णा बालमुरली को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। साथ ही सर्वश्रेष्ठ पटकथा और सर्वश्रेष्ठ पृष्ठभूमि स्कोर का भी सम्मान मिला। फिल्म को गोल्डन ग्लोब्स के विदेशी भाषा वर्ग में भेजा गया और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रशंसा मिली।

 

रोचक तथ्य:


•  फिल्म कैप्टन गोपीनाथ की असली कहानी पर आधारित है, जिन्होंने एयर डेक्कन के ज़रिये भारत में किफायती हवाई यात्रा की शुरुआत की।
•  कोविड 19 महामारी के कारण इसे सिनेमाघरों की बजाय सीधे अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ किया गया, लेकिन यह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली भारतीय फिल्मों में से एक बन गई।
•  फिल्म का हिंदी रीमेक ‘सर्फ़िरा’ 2024 में आया, जिसमें अक्षय कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई।
•  निर्देशक सुधा कोंगरा ने शूटिंग के दौरान असली हवाई अड्डों और छोटे रनवे का उपयोग किया ताकि फिल्म में यथार्थता बनी रहे।

 

‘सोरारई पोटरू’ सिर्फ एक बायोपिक नहीं, बल्कि सपने देखने, लड़ने और उन्हें साकार करने की कहानी है। यह बताती है कि अगर इरादा मजबूत हो और जनता का समर्थन मिले, तो आसमान भी सीमा नहीं होता।


तारीख: 08.08.2025                                    Filmy Romeo




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