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हमारे मोहल्ले की एक आंटी अक्सर शादीशुदा लड़कियों को देख कर पूछती थीं – "खुशखबरी कब दे रही हो?" और हम सब हँस पड़ते थे, पर कभी सोचा नहीं कि माँ-बाप बनने का संघर्ष क्या होता है।
लेकिन जब “विक्की डोनर” देखी, तो पहली बार लगा कि माँ-बाप बनना सिर्फ एक नेचुरल प्रक्रिया नहीं, कई बार एक सामाजिक, भावनात्मक और मेडिकल लड़ाई भी होती है—और इस लड़ाई में विज्ञान के साथ समाज की सोच भी बहुत बड़ा रोल निभाती है।
विक्की अरोड़ा (आयुष्मान खुराना) दिल्ली के लाजपत नगर का एक युवा है—बेफिक्र, स्मार्ट, थोड़ा लापरवाह, और पूरी तरह से पंजाबी। घर में माँ और दादी के साथ रहता है और उनकी चप्पल से डरता भी है और प्यार भी करता है।
एक दिन उसकी मुलाकात होती है डॉ. बलदेव चड्ढा (अनु कपूर) से, जो एक इनफर्टिलिटी क्लिनिक चलाते हैं और एक ‘उत्कृष्ट’ स्पर्म डोनर की तलाश में हैं।
डॉ. चड्ढा को विक्की में सब दिखता है—स्वस्थ जीवनशैली, मजबूत जीन, और परंपरागत पंजाबी खून।
शुरुआत में विक्की इस विचार से झिझकता है, लेकिन पैसों की तंगी, अपने सपनों और माँ की ज़रूरतों को देखते हुए वह डोनेशन के लिए मान जाता है।
धीरे-धीरे विक्की इस ‘गुप्त’ काम में एक्सपर्ट हो जाता है—उसके स्पर्म से कई जोड़ों को संतान मिलती है। लेकिन यह सब उसके निजी जीवन से छिपा होता है—यहाँ तक कि उसकी प्रेमिका और फिर पत्नी आशिमा रॉय (यामी गौतम) से भी।
आशिमा, जो बंगाली है और तलाकशुदा भी, विक्की से शादी करती है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि विक्की एक स्पर्म डोनर है, तो उसका विश्वास टूट जाता है।
यहीं से फिल्म एक नए मोड़ पर पहुँचती है—जहाँ एक प्रेम कहानी, एक सामाजिक विचार और एक वैज्ञानिक सच्चाई टकराते हैं।
शूजीत सरकार ने इस फिल्म को इतनी सरलता और गरिमा के साथ निर्देशित किया है कि ना तो विषय बोझिल लगता है, ना ही अश्लील।
यह फिल्म सेक्स, इनफर्टिलिटी और डोनेशन जैसे संवेदनशील विषयों को पूरी गरिमा, ह्यूमर और संवेदनशीलता के साथ हैंडल करती है।
डायरेक्शन इतना रियल है कि हर किरदार किसी जान-पहचान वाले जैसा लगता है—लाजपत नगर की गलियाँ, माँ का ब्यूटी पार्लर, बंगाली-पंजाबी बहसें, और डॉक्टर चड्ढा की जुनूनी वैज्ञानिकता—सबकुछ इतना भारतीय और आत्मीय।

आयुष्मान खुराना, जिन्होंने इसी फिल्म से अपना करियर शुरू किया, एकदम सटीक कास्टिंग हैं।
उनकी बॉडी लैंग्वेज, पंजाबी टोन, आँखों में शरारत और दिल में मासूमियत—विक्की के किरदार को बहुत ही नैसर्गिक बना देती है।
अनु कपूर फिल्म के सबसे बड़े सरप्राइज हैं—एक quirky, जुनूनी, eccentric डॉक्टर जो अपने मिशन को लेकर इतना समर्पित है कि उसकी पागलपंती दर्शकों को बेहद पसंद आती है।
यामी गौतम ने आशिमा के रूप में संयम, गरिमा और साहस को बड़ी खूबसूरती से निभाया है।
उनका किरदार सिर्फ एक लव इंटरेस्ट नहीं, बल्कि समाज का आइना है जो विक्की के फैसलों पर सवाल भी करता है और उन्हें समझने की कोशिश भी करता है।
विक्की की माँ (डॉली आहलूवालिया) और दादी (कमलिका चंद्रा) ने हल्के-फुल्के हास्य के साथ फिल्म को पारिवारिक माहौल दिया है।
फिल्म का लेखन जूही चतुर्वेदी ने किया है, और यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है।
संवाद चुटीले, असली और बेहद असरदार हैं।
“हमारे यहाँ स्पर्म डोनेशन तो गुनाह से कम नहीं समझा जाता, लेकिन बच्चे पैदा करने का दबाव रोज़ होता है।”
“पंजाबी स्पर्म है सर, एक नंबर।”
इस तरह के संवाद हँसाते हैं, लेकिन उनकी गहराई में छिपा सामाजिक संदेश दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है।
फिल्म का संगीत हल्का, मोहक और सिचुएशन के मुताबिक है।
“पानी दा रंग” को खुद आयुष्मान ने गाया है, जो आज भी रोमांटिक गानों की लिस्ट में शामिल रहता है।
इसके अलावा “मera mann” और “Rum Whiskey” जैसे गाने फिल्म की गति को बनाए रखते हैं।
यह फिल्म उन हजारों दंपत्तियों की कहानी है जो संतान की चाहत में समाज, डॉक्टरों और निजी संघर्षों से जूझते हैं।
यह सवाल उठाती है कि—
• क्या स्पर्म डोनेशन एक नैतिक अपराध है?
• क्या हम चिकित्सा विज्ञान को समझे बिना सिर्फ शर्म और संकोच के कारण उससे दूरी बना लेते हैं?
• क्या पिता बनने की परिभाषा सिर्फ जेनेटिक होना है या भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी भी मायने रखती है?
विक्की की माँ का संवाद, “उसने बच्चा नहीं बनाया, किसी का घर बसाया है,” फिल्म का सार है।
• राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म (सामाजिक विषय पर)।
• अनु कपूर को फिल्मफेयर अवॉर्ड – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता।
• आयुष्मान को सर्वश्रेष्ठ डेब्यू अवॉर्ड।
• फिल्म को इंटरनेशनल फिल्म समारोहों में भी सराहा गया।
• फिल्म की रिसर्च दिल्ली के असली इनफर्टिलिटी क्लिनिकों पर की गई थी।
• आयुष्मान खुद एक रियलिटी शो विजेता थे और उन्होंने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की थी—डायलॉग डिलीवरी, एक्सेंट और यहां तक कि स्क्रिप्ट में भी योगदान दिया।
• “पानी दा रंग” उन्होंने कॉलेज में लिखा था और फिल्म में शामिल किया गया।
“विक्की डोनर” एक ऐसी फिल्म है जो हँसाती भी है, सोचने पर मजबूर भी करती है, और अंत में दिल में जगह बना लेती है।
यह फिल्म आधुनिक भारतीय समाज को दिखाती है कि पारिवारिक मूल्य, विज्ञान और सामाजिक सोच का मेल अगर सही तरीके से हो, तो हर ‘संवेदनशील’ विषय भी सहज बन सकता है।
विक्की एक सुपरहीरो नहीं है, लेकिन उसने हज़ारों घरों में रौशनी लाई है—बिना केप, बिना उड़ने की शक्ति… बस थोड़ी समझदारी और इंसानियत के साथ।