
(लेखक – विजय शर्मा एरी, अजनाला, अमृतसर)
बेख़ौफ़ बादल जब बरसते,
नदियाँ सीमाएँ भूल जातीं,
छोटे छोटे गाँव, बस्तियाँ,
पलभर में जल में डूब जातीं।
बाढ़ का दानव आ जाता है,
निर्दयी, निष्ठुर, निर्मम बनकर,
किसानों के सपनों की फसलें
बह जातीं आँसुओं में घुलकर।
नन्हें बच्चे बिलख रहे हैं,
माँ की गोद तक डूबी जाती,
बुजुर्गों की आँखें पूछ रहीं –
“क्या यही हमारी किस्मत है साथि?”
मवेशी तिनकों से चिपके हैं,
झोंपड़ियाँ लहरों में टूट रहीं,
कोई छत पर बैठा रोता है,
कोई नाव में यादें बाँट रहा।
राहत की नावें कहाँ मिलेंगी?
कहाँ मिलेगा सूखा अन्न?
भूख प्यास से तड़प रही जनता,
ढूँढ रही है इंसानियत का धन।
बाढ़ का दानव निर्दयी बनकर,
जीवन का हर रंग छीन लेता,
फिर भी उम्मीद का दीप जलता—
मनुष्य हर बार खड़ा हो जाता।
हे प्रभु! तू दया बरसा देना,
सूखी ज़मीन पर हरियाली लाना,
फिर से खेतों में लहराएँगे सपने,