
(१)
उसकी दुनिया टेबल नंबर 21 और किचन के दरवाज़े के बीच सिमटी है,
बारह घंटे। पंद्रह हज़ार महीना।
"यस सर," " सॉरी , सर," "ला रहा हूँ मैम," कहते-कहते दिन ढलता है
और फिर रात भी उसी दिन में घुल जाती है।
कभी कॉफ़ी ठंडी होने पर ग्राहक की झिड़की,
कभी ऑर्डर में देर होने पर सेठ की गाली,
वो सब सुनता है, सिर झुकाकर।
जैसे सुनना और सिर झुकाना भी उसकी नौकरी का हिस्सा हो।
उसकी देह थकती है, पैर दुखते हैं,
पर थकने और दुखने की उसे इजाज़त नहीं है।
(२)
शहर में छठ के गीत बजने लगे हैं,
उसे अपना गाँव याद आता है,
नदी का घाट, और खरना की रात में बनने वाली गुड़ की खीर।
उसे अपनी बीवी और बच्चों की याद आती है।
उसे घर जाना है।
उसने सेठ से छुट्टी माँगी, "सेठ जी, छठ है, घर जाना है।"
सेठ ने घूर कर देखा, "त्योहार में ही सबको घर याद आता है?
यहाँ भीड़ कौन संभालेगा? नहीं मिलेगी छुट्टी।"
वह चुपचाप लौट आया,
जैसे उसकी इच्छा का कोई वज़न ही न हो।
(३)
शायद सेठ को तरस आया, या कोई और वेटर मिल गया होगा,
खरना की सुबह सेठ ने कहा, "जा, एक दिन के लिए हो आ।
पर कल शाम तक वापस आ जाना।"
उसकी आँखें चमक गईं।
वो भागा, बस पकड़ी, ट्रेन में लटका, फिर पैदल चला।
जब वो गाँव पहुँचा, तो सूरज डूब रहा था,
घर-घर से खरना के प्रसाद की ख़ुशबू आ रही थी।
उसके आँगन में दीया जल रहा था।
(४)
उसकी पत्नी ने उसे देखा, कुछ कहा नहीं, बस आँखों में पानी भर आया।
बच्चों ने उसे दौड़कर पकड़ लिया।
वह आँगन में एक कोने में बैठ गया।
उसकी पत्नी मिट्टी के बर्तन में गुड़ की खीर और रोटी लाई।
"खरना का परसाद है," उसने धीरे से कहा।
उसने खीर का पहला कौर मुँह में रखा।
वो सिर्फ़ गुड़ और चावल नहीं था,
वो उसके गाँव की मिट्टी थी, उसकी बीवी का इंतज़ार था,
उसके बच्चों का प्यार था।
वो स्वाद उसके अंदर उतरते ही,
बरसों का बाँध टूट गया।
वह कुछ बोला नहीं,
बस अपने बच्चों को देखता रहा, अपनी पत्नी को देखता रहा,
और उसकी आँखों से आँसू चुपचाप बहते रहे,
जो उस खीर की मिठास में घुल रहे थे।