
सोता मन उठा,
अचानक उठकर कुछ घबराया।
क्योंकि उसकी "इच्छा" (काम)
ने आ करके नींद से उसे जगाया।
बोली,
"इच्छा! क्यों डरते हो?
जो भी चाहो, वह पालो।"
नहीं मिलता है।
अगर प्रेम से "क्रोध" को पास बुला लो,
मन ने भी 'क्रोध' दिखाकर
जो चाहा, वो पाया।
क्रोध के आते ही "लोभ" ने
अपना रंग जमाया।
'लोभ' भी कहां चुप रहने वाला था।
फिर तपाक से बोला,
"जब तक हूं मैं पास तुम्हारे,ऐ मन!
तू बना रहेगा हिंडोला।"
काम, क्रोध, लोभ ने मिलकर
ऐसा जाल बिछाया,
"मोह" जाल में फंसाकर
मन को "मद" (अहंकार) से भी मिलवाया।
अब मद को देखकर "ईर्ष्या"
दूसरे मन की होली,
जिस मन की हो गई।
'ईर्ष्या' अब उसकी इच्छा भी बोली,
"संभल जा, तू भी क्या?
हम विकारों में पड़कर जीवन भर पछताएगा।"
सद् -विचारों को अपनाएगा,
तो जीवन ही सफल हो जाएगा।