
माना संबोधन में "जी" लगाना,
एक अच्छा संस्कार है ।
पर क्या वह संस्कार हीन है,
जिसका नहीं यह व्यवहार है ।
नहीं ! वह नहीं, संस्कार हीन है
जो! जी को नहीं अपनाता है।
लगता है उसका उस संबंधी से,
सबसे गहरा नाता है।
मैं भी अपनापन बतलाकर,
"जी" जब नहीं अपनाती हूॅं ।
किसी -किसी की नजरों में,
संस्कारहीन बन जाती हूॅं।
कुछ नहीं ! यह तो केवल,
उनकी समझ का धोखा है।
जो नहीं जानते अपनेपन को,
बस उन्होंने ही टोका है।
"जी" की तर्ज पर क्या कोई ,
संस्कार हीन बन जाता है ।
और भी तो व्यवहार हैं जो,
हमें संस्कारवान बनाता है।