सम्बोधन \"जी\"

माना संबोधन में "जी" लगाना,

एक अच्छा संस्कार है ।

पर क्या वह संस्कार हीन है,

जिसका नहीं यह व्यवहार है ।

नहीं ! वह नहीं, संस्कार हीन है

जो! जी को नहीं अपनाता है।

लगता है उसका उस संबंधी से,

सबसे गहरा नाता है।

मैं भी अपनापन बतलाकर,

"जी" जब नहीं अपनाती हूॅं ।

किसी -किसी की नजरों में,

संस्कारहीन बन जाती हूॅं।

कुछ नहीं ! यह तो केवल,

उनकी समझ का धोखा है।

जो नहीं जानते अपनेपन को,

बस उन्होंने ही टोका है।

"जी" की तर्ज पर क्या कोई ,

संस्कार हीन बन जाता है ।

और भी तो व्यवहार हैं जो,

हमें संस्कारवान बनाता है।


तारीख: 31.08.2025                                    निधी खत्री




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