
कविता, डिफेंस के बच्चों के जीवन की उन उलझनों, भावनाओं और अनुभवों को उकेरने का प्रयास करती है, जहाँ हर कुछ बरसों में बदलता परिवेश, नया शहर, नई भाषा, नई मित्रता और पुरानी यादों का बोझ शामिल होता है।
हम डिफ़ेंस के बच्चे,
हमने सीखा है
एक जगह से दूसरी जगह जाने में
यादों को समेटना,
दूरियों को निगलना,
और नए घर की दीवारों से
पुरानी पहचान जोड़ने का अभिनय करना।
हर दो-तीन बरस बाद
नक्शों पर खींची लकीरें बदल जाती हैं,
नई सड़कें, नई छतें, अनजानी ज़ुबान,
और हमारे भीतर
गहरी होती है एक ख़ामोशी।
स्कूल की दीवारें वही रहती हैं,
पर उनसे झाँकते नज़ारे बदल जाते हैं।
जिन चेहरों से मुस्कुराहटें बाँटीं,
उनके हाथ धीरे-धीरे
हमारी उँगलियों से छूट जाते हैं।
जब किसी अजनबी शहर में उतरते हैं,
हमारी मुट्ठियों में होती हैं
पुरानी तस्वीरें, अधूरी दोस्तियाँ,
क्रिकेट के मैदान की धूल,
गुलमोहर की वह महक
जो किसी पुराने शहर से
हमारे साथ चली आती है।
यहाँ, नए दोस्तों से परिचय करना
नए शब्द सीखने जैसा होता है—
धीमे-धीमे चेहरे पढ़ना,
कहानियाँ सुनना,
और महसूस करना
कि हम ख़ुद एक अबूझ पहेली हैं।
पिताजी के ट्रांसफ़र ऑर्डर के साथ ही
फिर एक बार
हमारी जड़ों के नीचे से
ज़मीन खिसक जाती है,
और हम निकल पड़ते हैं
अपनी छोटी-सी गाड़ी में
ढेर सारे बक्से, कुछ उम्मीदें,
और थोड़ी-सी हिचक लिए,
उस राह पर, जो हमारी नहीं,
नियति की चुनी हुई होती है।
हर नई जगह में
थोड़ा संकोच, थोड़ी जिज्ञासा,
कुछ नई खोज की उत्सुकता,
और पुरानी गलियों की कचोट
मिलकर हमें समझा देती है
कि घर चार दीवारों में नहीं,
बल्कि यादों, दोस्तियों,
और मन की कोमलता से बनता है।
हम डिफ़ेंस के बच्चे हैं—
हमारा घर इस देश के हर छोर तक फैला है,
हर शहर की धूल में,
हर स्कूल के बेंच पर
छूटा है हमारी यादों का एक हिस्सा।
हमारे दिलों में बसे हैं
असंख्य चेहरों के प्रतिबिंब,
जो कुछ बरस बाद
बादलों की तरह बिखर जाते हैं।
फिर भी जब एक नई जगह
हम बस्ता खोलते हैं,
तो धीरे-धीरे
सब परिचित-सा हो जाता है।
और हम जान जाते हैं
कि शायद हमारा "घर"
हमारे साथ चलता है—
हर शहर, हर सड़क, हर पड़ाव पर
थोड़ा-सा अपनापन,
थोड़ी-सी अनजानियत
और अनगिनत यादों के संग।