
चाँद को चाँद कहने के लिए,
ज़रूरी है पेट में रोटी का होना।
भूखे पेट चाँद नहीं, सिर्फ़ एक टुकड़ा उजाला होता है,
जो दूर आसमान में बेमानी-सा लगता है।
वो जो खिड़की से चाँद को ताकते हैं,
वो चाँद में ग़ज़ल ढूँढते हैं,
लेकिन जो दिन भर मिट्टी खोदते हैं,
उनके लिए ये बस एक धुँधला-सा दिया होता है।
चाँद को चाँद कहने के लिए,
ज़रूरी है दिल में थोड़ी फ़ुर्सत का होना।
वरना उजाला भी बोझ-सा लगता है,
और चाँद महज़ उदासी का पता देता है।
जब तक चाँद की रोशनी में,
हर घर की खिड़की से ख़ुशी झाँकती नहीं,
तब तक चाँद को चाँद कहना,
शायद वाकई में अधूरा-सा लगता है।
इसलिए चाँद को चाँद कहने के लिए,
पहले चाँदनी में जीने का हक़ होना चाहिए।
रोटी, चैन और एक छोटी-सी खिड़की,
जहाँ से चाँद सच में चाँद नज़र आता है।