पुलिसवाले की फटी जेब


फटी जेब लिए थानेदार,
जल्दी से पहुँचा दर्ज़ी के द्वार।
बोला— "जल्दी सी दे भाई,
इससे होती है बड़ी कमाई !"

दर्ज़ी ने सुई-धागा थामा ,
मुस्कुरा कर पूछा—
"साहब, इतनी क्यों बेचैनी है,
कैसी आफ़त आन पड़ी है?"

थानेदार झेंप कर बोला—
"इस फटी जेब के पीछे
मेरा रोज़ का हिसाब है;
चौराहे से थाने तक
हर नोट का हिसाब-किताब है!"

"जब तक जेब ये फटी रहेगी,
हर पत्ती हवा में उड़ जाएगी।

मेहनत से कमाई मेरी,
सड़क पर ही बिखर जाएगी!"

दर्ज़ी बोला, "साहब सुनिए,
यहाँ बात बड़ी गंभीर है।
आपकी जेब सी दूँ मैं,
पर जो फटी नीयत है
उसका क्या इलाज करूँ?"

थानेदार झुँझलाकर बोला—
"ओ दर्ज़ी, दार्शनिक मत बन,
बस जेब सी दे जल्दी से,
वरना तेरी जेब भी टटोलूँगा!"

सुई-धागे की चुप्पी में
कहानी थी साफ़-साफ़:
फटी जेब तो सिल जाएगी,
पर फटी ईमान की सिलाई,
किस दर्ज़ी के बस में है?

पुलिसवाला चला गया
जेब सिलाकर, मुस्कुराता हुआ।
पर दर्ज़ी की उँगलियाँ अब भी
सोच में डूबी थीं—
कि कौन आएगा,
कब आएगा
फटी नीयत सिलाने?


तारीख: 11.08.2025                                    मुसाफ़िर




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