
संकेतों, यादों और रिश्तों की अधूरी परिपाटी का संग्रह
दिव्य प्रकाश दुबे को आज की हिन्दी का वह लेखक कहा जा सकता है जिसने “बातचीतनुमा गद्य” को साहित्य के केंद्र में ला खड़ा किया। उनकी लेखनी में जीवन की छोटी-छोटी बातें इतनी सहजता से उतर आती हैं कि पाठक उन्हें अपने अनुभव से जोड़ लेता है। Terms & Conditions Apply और Musafir Café जैसी लोकप्रिय कृतियों के बाद आई Aako Bako (2019) उनके प्रयोगशीलता का प्रमाण है।
यह किताब सीधी-सादी कथा संरचना से अलग है। यहाँ कहानी रैखिक नहीं, बल्कि बिखरे हुए संकेतों, स्मृतियों और संवादों में बुनी जाती है। ‘आको-बाको’—बचपन का खेल, उलझी रेखाओं से निकलती आकृतियाँ—यह नाम ही बताता है कि यह संग्रह जीवन और रिश्तों की उन उलझी रेखाओं पर केंद्रित है जिन्हें आसानी से परिभाषित नहीं किया जा सकता।
• Aako Bako — बचपन में खींची गई टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ। कभी उनमें आकृतियाँ बन जाती हैं, कभी बस धुंधली लकीरें रह जाती हैं।
• यह शीर्षक जीवन और रिश्तों का रूपक है—साफ़-सुथरे नहीं, बल्कि टेढ़े-मेढ़े और अधूरे।
• हर कहानी इस किताब में किसी “आको-बाको” खेल जैसी लगती है—जहाँ पाठक खुद पैटर्न खोजने की कोशिश करता है।
• स्थान: आधुनिक शहरी और कस्बाई परिवेश; कभी घर, कभी कैफ़े, कभी सड़कें और कभी दफ़्तर।
• टोन: स्मृतिपरक, आत्ममंथनशील, कभी हल्का और कभी गहरा।
• दृष्टि: रिश्तों के अधूरेपन और यादों की बिखरी लकीरों पर।
Aako Bako कोई पारंपरिक उपन्यास नहीं है, बल्कि एक संग्रह है—छोटी कहानियों, लघु गद्यांशों और आत्ममंथनशील टुकड़ों का।
(1) बचपन की परछाई
कुछ अंश बचपन की यादों से जुड़े हैं—खेल, स्कूल, दोस्तों की हँसी। लेकिन ये स्मृतियाँ सिर्फ़ नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण हैं कि बचपन की अधूरी आकृतियाँ ही बड़े होकर रिश्तों का रूप लेती हैं।
(2) दोस्ती और मोहब्बत
किताब में कई छोटे-छोटे टुकड़े दोस्ती और मोहब्बत के अनकहे पहलुओं पर हैं। कभी कोई अधूरी चिट्ठी, कभी कोई छूटी हुई मुलाक़ात। लेखक यह नहीं बताते कि अंत में क्या हुआ, बल्कि अधूरापन ही छोड़ देते हैं।
(3) संकेत और अधूरापन
यह संग्रह अधूरेपन की ही बुनावट है। पाठक से उम्मीद की जाती है कि वह इन टुकड़ों को जोड़कर अपनी आकृति बनाए—जैसे ‘आको-बाको’ खेल में होता है।
(4) जीवन का बिखराव
कुछ हिस्से बेहद छोटे हैं—सिर्फ़ दो-तीन पंक्तियाँ। जैसे कोई अचानक याद आया वाक्य, कोई बिखरी हुई सोच। ये छोटे टुकड़े मिलकर जीवन का बिखराव दिखाते हैं।

• ‘मैं’ या कथावाचक — यह किताब मुख्यतः आत्मस्वीकृति और आत्मसंवाद की है। पात्रों की पहचान धुंधली है।
• दोस्त/प्रेमी/परिवार — कहानियों में आते-जाते चेहरे हैं। वे ज्यादा विस्तार में नहीं, बल्कि झलकियों में दिखते हैं।
• पाठक — यहाँ पाठक भी अप्रत्यक्ष पात्र बन जाता है। क्योंकि इन अधूरे संकेतों को जोड़ने का काम उसी को करना है।
• भाषा: दिव्य प्रकाश दुबे की सहज और बातचीतनुमा शैली। छोटे-छोटे वाक्य, जिन्हें पढ़ते समय लगता है जैसे कोई दोस्त कह रहा हो।
• शिल्प: प्रयोगशील। पारंपरिक कथा संरचना से बाहर, टुकड़ों और झलकियों का सिलसिला।
• विशेषता: संग्रह का हर अंश “कोट-योग्य” है। एक-एक लाइन किसी बड़ी कहानी का सार बन सकती है।
1. अधूरापन और उलझन
यह किताब बताती है कि जीवन और रिश्ते सीधे नहीं, बल्कि टेढ़े-मेढ़े हैं।
2. स्मृति और वर्तमान
बचपन की स्मृतियाँ और वर्तमान की जद्दोजहद लगातार टकराती रहती हैं।
3. संवाद और मौन
कभी कहानी संवाद से चलती है, कभी अचानक मौन से।
4. जीवन की आकृतियाँ
जीवन एक आको-बाको खेल है—कभी आकृति बनती है, कभी सिर्फ़ लकीरें रह जाती हैं।
• Aako Bako ने दिव्य प्रकाश दुबे को कथाकार से आगे बढ़कर प्रयोगशील गद्यकार के रूप में स्थापित किया।
• यह किताब पारंपरिक पाठकों के लिए थोड़ी कठिन है, लेकिन युवा पीढ़ी ने इसे हाथोंहाथ लिया।
• इसके छोटे-छोटे अंश सोशल मीडिया पर खूब साझा किए गए, और यह किताब “इंस्टा-जेनरेशन” की लाइब्रेरी में अपनी जगह बना पाई।
Reviewer’s Take
Aako Bako को पढ़ते समय सबसे पहले यह एहसास होता है कि यह किताब किसी ‘कहानी’ की तरह नहीं, बल्कि किसी ‘डायरी’ की तरह है। यहाँ कोई रैखिक कथानक नहीं, कोई आरंभ-मध्य-अंत नहीं। यहाँ सिर्फ़ जीवन के छोटे-छोटे टुकड़े हैं, जिन्हें लेखक ने वैसे ही छोड़ दिया है।
दुबे का यह प्रयोग अनोखा है। वे पाठक पर भरोसा करते हैं कि वह इन टुकड़ों से अपनी आकृति बनाएगा। यह भरोसा ही किताब की सबसे बड़ी ताक़त है।
इस संग्रह का सबसे खास पहलू है—संकेतों की भाषा। कोई वाक्य सिर्फ़ इतना कहता है: “वह चुप रही, और मैं समझ गया।” यहाँ पूरी कहानी केवल उस एक चुप्पी में है। यह न्यूनतमवाद (minimalism) हिन्दी में दुर्लभ है, और दुबे इसे सफलतापूर्वक रचते हैं।
पाठक को कहीं-कहीं अधूरापन खलता भी है। लगता है कि लेखक कहानी को बीच में छोड़कर आगे बढ़ गया। लेकिन फिर यही अधूरापन जीवन का भी तो सच है। क्या हमारी ज़िंदगी की कहानियाँ कभी पूरी होती हैं? क्या हर रिश्ता साफ़-सुथरे निष्कर्ष तक पहुँचता है?
भाषा यहाँ बेहद हल्की और आत्मीय है। हर अंश पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखक आपके बगल में बैठा है और अपनी डायरी से एक वाक्य पढ़ रहा है। इस सादगी में गहराई है—क्योंकि भारी शब्दों के बिना भी बातें दिल तक उतर जाती हैं।
Aako Bako का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है बचपन और वर्तमान का संगम। बचपन की टेढ़ी-मेढ़ी आकृतियाँ आज भी हमारे रिश्तों को प्रभावित करती हैं। बचपन के अधूरे खेल, भूले-बिसरे दोस्त, और अधूरी बातें—वे सब यहाँ फिर से सामने आते हैं।
इस संग्रह को अगर किसी शैली में रखा जाए तो यह “fragmented narrative” है—खंडित कथाएँ, जिनसे पूरा जीवन झाँकता है। और यही इसे आधुनिक बनाता है।