
विस्थापित बंगाली शरणार्थियों पर केन्द्रित गाँव-समाज में स्त्री-दृष्टि; पवित्रा प्रमुख पात्र
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (1921–1977) हिन्दी के उन विरल कथाकारों में हैं जिन्होंने उपन्यास को आंचलिकता और लोकजीवन की सुगंध दी। मैला आँचल (1954) से वे हिन्दी में “आंचलिक उपन्यास” की परम्परा स्थापित कर चुके थे। पर जुलूस (1966) उनकी एक अलग, विशेष कृति है—जहाँ बिहार के सीमावर्ती गाँवों में आये बंगाली शरणार्थियों (1947 के बाद विस्थापित, विशेषकर ‘पूर्वी पाकिस्तान’ से) का जीवन और स्थानीय समाज से उनकी टकराहट-घुलनशीलता चित्रित है।
यह उपन्यास स्त्री-दृष्टि से विशिष्ट है—क्योंकि इसका मुख्य पात्र है पवित्रा, जो बंगाल से विस्थापित होकर बिहार के गाँव में आती है। उसके अनुभवों से उपन्यास विस्थापन, स्त्री-अस्मिता और गाँव-समाज की कसमसाहट को उजागर करता है।
• स्थान: बिहार का सीमावर्ती गाँव, जहाँ बंगाली शरणार्थियों की बस्ती बसाई गयी है।
• समय: 1950–60 का दशक; विभाजन के बाद शरणार्थियों का आगमन, और भारतीय ग्रामीण समाज का संक्रमण।
• टोन: गहरे मानवीय सरोकार वाला, आंचलिक बोली-संवादों से भरा, पर साथ ही आत्मविश्लेषी और करुण।
(1) पवित्रा और उसका आगमन
पवित्रा एक युवा बंगाली महिला है, जो शरणार्थी शिविर से निकलकर गाँव में आती है। उसका अतीत दुःख, हानि और अपमान से भरा है। नए गाँव में भी वह खुद को बाहरी और संदिग्ध महसूस करती है।
(2) गाँव और विस्थापितों का टकराव
स्थानीय ग्रामीण (मुख्यतः मैथिली–बिहारी) और विस्थापित बंगाली शरणार्थियों के बीच सामाजिक-आर्थिक तनाव है। स्थानीय लोग उन्हें “अनधिकार-प्रवेशी” मानते हैं, जबकि शरणार्थी अपनी नयी ज़मीन पर हक़ जताना चाहते हैं।
(3) पवित्रा का अकेलापन और संघर्ष
पवित्रा का जीवन केवल विस्थापन से ही नहीं, बल्कि स्त्री होने की दोहरी विवशता से भी घिरा है। उसका पति/परिवार या तो नष्ट हो चुका है, या अप्रभावी है। पवित्रा को नये समाज में खुद को सिद्ध करना है।
(4) गाँव-समाज की प्रतिक्रिया
गाँव वाले पवित्रा को संदेह, आकर्षण और दूरी—तीनों से देखते हैं। कुछ लोग उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं, कुछ उसे “विदेशिनी” और “घुसपैठिया” मानकर बहिष्कृत करते हैं।
(5) जुलूस—प्रतीक और घटना
उपन्यास में “जुलूस” केवल राजनीतिक या सामाजिक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि मानवीय अस्तित्व की भीड़ और चीख का प्रतीक है। शरणार्थियों का जुलूस, गाँव के भीतर विरोध और समर्थन का जुलूस, और अंततः पवित्रा के जीवन का अकेला जुलूस—ये सब एक-दूसरे में घुलते हैं।
(6) अंत—अधूरा समाधान
उपन्यास का अंत किसी निश्चित समाधान पर नहीं पहुँचता। पवित्रा अपने अस्तित्व की लड़ाई जारी रखती है। विस्थापित समुदाय का दर्द और गाँव-समाज का संकुचित व्यवहार दोनों मिलकर कहानी को अधूरा, पर तीखा बना देते हैं।
• पवित्रा — मुख्य पात्र; बंगाली शरणार्थिनी। उसका जीवन उपन्यास का केन्द्र है। वह स्त्री-संवेदना, विस्थापन और आत्म-संघर्ष का प्रतीक है।
• गाँव के पुरुष पात्र — कुछ सहायक, कुछ शोषक, कुछ आलोचक; पवित्रा के लिए ये समाज की सामूहिक नजर का प्रतीक हैं।
• शरणार्थी समुदाय — पवित्रा का अपना नया परिवार; जिनके साथ वह सामूहिक रूप से गाँव में टिकने की कोशिश करती है।
• स्थानीय महिलाएँ — पवित्रा के प्रति जिज्ञासा और दूरी दोनों रखती हैं; स्त्री–एकजुटता और स्त्री–प्रतिस्पर्धा का द्वंद्व इन्हीं के जरिए उभरता है।

• आंचलिक यथार्थ: मैथिली–बंगाली–हिन्दी के बोलचाल मिश्रित संवाद।
• भाषा: लोकल शब्दावली और बोली की सजीवता, साथ ही करुण और आत्मविश्लेषी कथन।
• प्रतीकात्मकता: ‘जुलूस’ जीवन की भीड़ और विस्थापन का रूपक है।
• नारी-दृष्टि: पवित्रा का नारी–अनुभव उपन्यास की आत्मा है।
1. विस्थापन और शरणार्थी जीवन
विभाजन और राजनीतिक घटनाओं से उत्पन्न विस्थापन किस तरह व्यक्तिगत जीवन को झकझोर देता है।
2. गाँव बनाम बाहरी
स्थानीय और शरणार्थी समुदाय का द्वंद्व सामाजिक अस्मिता के प्रश्न उठाता है।
3. स्त्री की अस्मिता
पवित्रा केवल शरणार्थी नहीं, बल्कि एक स्त्री है—जिसके संघर्ष में दोगुनी घुटन है।
4. आंचलिकता और व्यापकता
उपन्यास आंचलिक परिवेश में लिखा गया है, पर मुद्दा सार्वभौमिक है—मानव का घर, पहचान और सम्मान।
• जुलूस को आंचलिक उपन्यास परम्परा की एक विशिष्ट कड़ी माना गया।
• इसने मैला आँचल के बाद रेणु की रचनात्मकता को नया मोड़ दिया—जहाँ उन्होंने स्त्री–दृष्टि और विस्थापन जैसे बड़े मुद्दे उठाए।
• पवित्रा का चरित्र हिन्दी साहित्य की प्रमुख स्त्री-पात्र परंपरा में गिना जाता है।
• यह उपन्यास विभाजन-साहित्य और विस्थापन पर लिखे हिन्दी उपन्यासों की अग्रणी कृतियों में शामिल है।
• रेणु राजनीति में भी सक्रिय रहे; वे नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल हुए थे।
• जुलूस 1966 में प्रकाशित हुआ और इसे अकादमिक हलकों में “आंचलिकता से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय–राजनीतिक मुद्दों की ओर” रेणु का कदम माना गया।
• यह उपन्यास बाद में कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हुआ।
1. पवित्रा के दृष्टिकोण से कथा को पढ़ें—वह शरणार्थी और स्त्री दोनों है।
2. गाँव–स्थानीय बनाम शरणार्थी समुदाय के संवादों में छिपी राजनीति को पकड़ें।
3. “जुलूस” को केवल घटना नहीं, बल्कि प्रतीक समझें—विस्थापित जीवन का सामूहिक स्वर।
4. इसे मैला आँचल (रेणु) और झूठा सच (यशपाल) के साथ पढ़ें—तीनों मिलकर विस्थापन, राजनीति और स्त्री-अनुभव का त्रिकोण बनाते हैं।
Reviewer’s Take
जुलूस हिन्दी साहित्य में एक गहरी मानवीय कृति है। यह विस्थापन और शरणार्थी जीवन का दस्तावेज़ है, पर इसकी आत्मा है—पवित्रा की स्त्री-दृष्टि।
रेणु ने दिखाया कि स्त्री जब घर और गाँव से उखाड़कर फेंकी जाती है तो उसका जीवन केवल भूगोल नहीं खोता, बल्कि उसकी आत्मा भी विस्थापित हो जाती है।
एक पंक्ति में: जुलूस शरणार्थियों के भीड़भरे कदमों के बीच एक अकेली स्त्री की करुण आवाज़ है, जो अपने घर और पहचान की तलाश में भटकती रहती है।