
रेणु का जुलूस (1966) अक्सर मैला आँचल और परती परिकथा की आभा में कम पढ़ा जाता है, जबकि यह उपन्यास आज़ादी के बाद के भारत—खासकर पूर्वी भारत—की एक ज्वलंत, पर कम प्रतिनिधित्वित कथा को केंद्र में लाता है: पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए बंगाली हिंदू शरणार्थियों का आगमन, उनका बसना, और एक बिहारी गाँव की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परतों से उनका टकराव/मेल। पुस्तक का प्रथम प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ और इसकी काया अपेक्षाकृत छोटी (लगभग 135–150 पृष्ठ, संस्करणानुसार) होने पर भी विषय का आयाम बड़ा है।
कथा बिहार के गोरियार गाँव में घटित होती है; यहाँ एक कालोनी बसती है—पूर्वी पाकिस्तान के दंगों में उजड़ी आबादी का छोटा-सा संसार। गाँव की जातिगत-सामुदायिक संरचना, स्थानीय सम्पन्न समुदायों की ताक़त, और शरणार्थियों के प्रति आरंभिक संदेह—इन सबके बीच धीरे-धीरे संबंध, आकर्षण, भय, शोषण और सह-अस्तित्व की नई-नई रेखाएँ बनती-बिगड़ती हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 1947 के बाद की निरंतर आव्रजन-धाराएँ और विशेषतः 1964 के पूर्वी पाकिस्तान दंगे—जिन्होंने बड़े पैमाने पर शरणार्थी-विस्थापन को जन्म दिया—पाठ में अप्रकट संदर्भ की तरह गूँजते हैं।
शरणार्थियों के समूह में उभरती है पवित्रा—दंगों में माता-पिता और मंगेतर खो चुकी एक शिक्षित, आत्मगौरवशील युवा स्त्री—जो अनौपचारिक ढंग से कालोनी की अगुवाई करती है। दूसरी ओर गाँव का सबसे धनी और प्रभावशाली व्यक्ति तालेवर गोढी है—स्थानीय ‘गोधी’ समुदाय का प्रतिनिधि, जो तांत्रिक-विद्या और लालसाओं के मेल से सत्ता चलाता है। वह पवित्रा के सौंदर्य और हैसियत की खबर पाते ही कालोनी में दिलचस्पी दिखाने लगता है; अपने चेले जयराम सिंह को भी भेजता है, जो ‘तांत्र’ और ‘जादू-टोने’ की आड़ में स्त्री-इच्छा पर अधिकार जमाने के कुटिल खेल खेलता है। आगे चलकर कालोनी और गाँव के बीच आवाजाही बढ़ती है—कुछ रिश्ते बनते हैं, कुछ टूटते हैं; शरणार्थियों की जीवटता और ग्राम-सत्ता का दंभ आमने-सामने आते हैं। उपन्यास ‘घटनाओं’ से अधिक ‘वातावरण’ रचकर जनजीवन की उजली–काली परछाइयों को उभारता है।
रेणु कई बारीक प्रसंगों से मानवीय ताप बढ़ाते हैं—जैसे पवित्रा का प्रकृति-निरिक्षण, पक्षियों/धुनों से उसका स्नेह (आरंभिक हिस्सों में ‘हल्दी-चिरैया’ का मोटिफ़), और कालोनी में सामूहिक श्रम-साझेदारी। ये प्रसंग शरणार्थी जीवन को सिर्फ़ पीड़ा-कथा नहीं रहने देते; वह स्वाभिमान और सांस्कृतिक स्मृति की कथा भी बनता है।
• पवित्रा: दंगों की त्रासदी से जली-बची, पर भीतर से सुव्यवस्थित, सह-अस्तित्व और सम्मान की पैरोकार। वह ‘दया-योग्य नायिका’ नहीं; नैतिक-बल वाली मनुष्य है, जो अपने समुदाय की गरिमा और सुरक्षा दोनों की चिन्ता करती है।
• तालेवर गोढी: गाँव का अनौपचारिक ‘सरदार’; धन, जाति-स्थिति और झोलाछाप तंत्र-मंत्र का गठजोड़। स्त्री-देह पर ‘अदृश्य अधिकार’ जमाने की उसकी वृत्ति सत्ता-छल का रूपक बन जाती है।
• जयराम सिंह: तालेवर का शागिर्द; तंत्र-टोने और अफ़वाहों के जरिए नियंत्रण रचता है—लोक-धर्म, अंधविश्वास और सत्ता-नैतिकता के धुँधले क्षेत्र का प्रतिनिधि।
• गाँव/कालोनी (समूह-चरित्र): गोधी/अन्य जाति-समुदाय, कारीगर/किसान, मुसाफ़िर/मक़ामी—यह ‘समूह’ ही असली नायक है, जो विस्थापन के साथ अपने-अपने हिसाब से बर्ताव करता है—कहीं सहानुभूति, कहीं संदेह, कहीं अवसरवाद। अल्प-संदर्भों में अन्य नाम भी आते हैं (जैसे ‘पारस’), जो ग्राम-सत्ता और दैनंदिन जीवन का नेटवर्क दिखाते हैं।
रेणु का यहाँ का शिल्प आंचलिक होते हुए भी खुले मैदान में आता है—बोली-बानी, ध्वनियाँ, गंध, लोक-कथाएँ और मिथक मिलकर एक ‘जीवित साउंड-स्केप’ बनाते हैं; पर जुलूस में वे सिर्फ़ लोक-रंग नहीं घोलते, बल्कि सत्ता-सम्बन्ध, सामुदायिक मनोविज्ञान, और विस्थापन-राजनीति का दर्पण भी रचते हैं। भाषा में मैथिल/अंगिका की आहट, संस्कृत पद-बिम्ब (जैसे “का कस्य परिवेदना?”) और बंगाली स्वरों की छाया साथ-साथ चलती है—कारण, कथा में इंटर-कल्चरल सान्निध्य है।
रेणु की ठाठ यही है कि वे घटनाओं का ‘घोष’ नहीं करते; वे ‘धीमे ताप’ पर पकाते हैं। छोटी-छोटी स्थितियाँ—चूल्हे की आँच, पान की गिलौरी, ताड़ी-चौपाल, पाखियों की हुंकार—कथा को दृश्य-श्रव्य बनाती हैं; वहीं अफ़सरशाही/ठेकेदारी/जाति-राजनीति का शोरपोल भी सुनाई देता है।
1. विस्थापन और पुनर्बसाव
उपन्यास का मूल प्रतिपाद्य शरणार्थी-जीवन है—सिर्फ़ ‘दया की वस्तु’ नहीं, बल्कि अपने घावों के साथ खड़ी सामुदायिक नैतिकता। नई जगह, नई ज़मीन, नए कानून—इन सबके बीच हक़, सम्मान और सुरक्षा की लड़ाई रोज़मर्रा की है। 1964 के पूर्वी पाकिस्तान दंगे जैसे संदर्भों का दूरस्थ-प्रतिध्वनि पाठ में मिलती है; उपन्यास किसी घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि मानवीय-स्तर पर विस्थापन की राजनीति को दिखाता है।
2. देह पर पहरा, सत्ता का छद्म
तालेवर–जयराम की जोड़गोई दिखाती है कि कैसे स्त्री-देह पर ‘अधिकार’ के नाम पर धर्म/तंत्र/परम्परा की गठजोड़-राजनीति चलती है। पवित्रा का प्रतिरोध—कभी चुप्पी, कभी तीखी स्पष्टता—इस दोगलेपन को उघाड़ता है। यह रेखा रेणु के स्त्री-पात्रों की मजबूत परंपरा में नई कड़ी जोड़ती है।
3. ‘भीतर’ बनाम ‘बाहर’
कालोनी ‘बाहर’ है, गाँव ‘भीतर’—पर धीरे-धीरे भीतर/बाहर का यह विभाजन टूटता–जुड़ता है। जिज्ञासा से शुरू होकर यह दूरी कभी सहयोग, कभी लालच, कभी घृणा और कभी प्रेम में बदलती है। ‘जुलूस’ शीर्षक केवल सड़कों का जुलूस नहीं; यह भावनाओं, अफ़वाहों और शक्ति-प्रदर्शन का जुलूस भी है—अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों पंक्तिबद्ध होकर चलती हैं।
हिन्दी/अंग्रेज़ी के संदर्भ-लेख जुलूस को रेणु की ‘शरणार्थी-केन्द्रित’ रचना मानते हैं—जो पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों की सामाजिक-आर्थिक मनःस्थितियों का गंभीर चित्र बनाती है। कुछ आलोचकों ने इसे आंचलिकता से आगे बढ़कर ‘दस्तावेज़ी-यथार्थ’ की ओर जाने वाला उपन्यास बताया—जहाँ लोक-रस और नीति-राजनीति साथ-साथ चलते हैं। हिन्दी विकि/सार-संग्रहों में भी यह संकेत है कि यहाँ रेणु आंचलिक रंगत के साथ राजनीतिक विकृतियों का पूर्वाभास कराते हैं।

• प्रकाशन-वर्ष और प्रकाशक: प्रथम प्रकाशन 1966, भारतीय ज्ञानपीठ; आज अनेक संस्करण (राजकमल सहित) उपलब्ध—काया छोटी, पर विषय व्यापक।
• रेणु की सक्रिय नागरिक-आवाज़: 1970 का पद्मश्री; आपातकाल (1975–77) के विरोध में 1977 में पुरस्कार लौटाया—यह उनकी लेखकीय-नागरिक नैतिकता का महत्वपूर्ण प्रसंग है।
• रचनात्मक व्याप्ति: उपन्यासों के साथ संस्मरण/रिपोर्ताज/कहानियाँ—मारे गए गुलफ़ाम पर आधारित फिल्म तीसरी कसम (1966) रेणु की कथा-लोकधुन का लोकप्रिय रूपांतरण है।
जुलूस हिन्दी में शरणार्थी-जीवन का एक दुर्लभ ग्रामीण फ्रेम देता है—पॉलिसी/कानून की भाषा से दूर, पर उससे प्रभावित जनजीवन के साक्ष्य की तरह। उपन्यास बताता है कि पुनर्बसाव केवल भूखंड/राशनकार्ड का प्रश्न नहीं; वह सम्मान, सुरक्षा, स्थानीय स्वीकार्यता और स्त्री-स्वायत्तता का भी प्रश्न है। 1960 के दशक के पूर्वी पाकिस्तान दंगों की पृष्ठभूमि से उपजा यह अनुभव आज भी गूंजता है—हालिया वर्षों में नागरिकता/दस्तावेज़ और बंगाली-भाषी शरणार्थी समुदाय पर चली बहसें दिखाती हैं कि नीति और ज़मीन के बीच दूरी आज भी बनी हुई है। (समाचार/रिपोर्टें बताती हैं कि दशकों पुराने विस्थापन की स्मृति/दस्तावेज़-रिक्तता आज भी अनेक परिवारों को अनिश्चितता में रखती है।)
• पहले अध्यायों में कालोनी का बसना, पवित्रा का आत्म-स्वर, और गाँव की जिज्ञासा/दूरी—ये स्वर/गंध/लय पकड़िए।
• मध्यांश में सत्ता-छल (तालेवर–जयराम), अफ़वाह/तंत्र-टोटका, और ‘भीतर–बाहर’ की रेखाओं का खिंचना-मिटना—यहाँ रेणु का सामाजिक-नाट्य अपने उत्कर्ष पर है।
• अंतिम हिस्सों में मनुष्यों के ‘जुलूस’—नैतिक/अनैतिक—का टकराव; शरणार्थी-जीवन की आत्मसम्मान-यात्रा; और गाँव-समाज की आत्मचेतना—ये सब मिलकर एक खुला, पर तीखा प्रभाव छोड़ते हैं। (यह उपन्यास घोषणा नहीं करता; पाठक से सोच की माँग करता है।)
रेणु के यहाँ दृश्य-रचना इतनी घनी है कि गाँव/कालोनी चरित्र बन उठते हैं। बोली की झंकार, लोक-गीत/कहानियाँ, पक्षियों/ऋतु का संगीत—ये सब एक साथ जीवन-रस रचते हैं; वहीं सत्ता/जाति/अंधविश्वास की सख्त परतें कथा को धार देती हैं। जुलूस इस मायने में रेणु का ‘लघु-आयतन, विशाल-प्रभाव’ उपन्यास है—कम पृष्ठों में बड़ा समाज।
यदि मैला आँचल रेणु का ग्राम-विश्व का विराट फलक है और परती परिकथा भूमि-सुधार/समुदाय-राजनीति का दस्तावेज़, तो जुलूस विस्थापन का अंतरंग समाजशास्त्र है—जहाँ शरणार्थी-जीवन, स्त्री-स्वायत्तता और ग्राम-सत्ता का त्रिकोण सधी, पर तीव्र संवेदना से उभरता है। पवित्रा याद रह जाती है—क्योंकि वह ‘पीड़िता’ होकर भी अथाह ताक़त का स्रोत है; तालेवर–जयराम याद रह जाते हैं—क्योंकि वे परम्परा/धर्म/तंत्र के मोहड़ों से झाँकती सत्ता-लालसा का मुखौटा हैं। और सबसे बढ़कर, गोरियार और उसकी कालोनी याद रह जाते हैं—क्योंकि वहीं मनुष्य ‘जुलूस’ की तरह आते-जाते, बदलते-बनते दिखते हैं।
आज के पाठक के लिए यह उपन्यास इसलिए ज़रूरी है कि यह हमें याद दिलाता है—पुनर्बसाव सिर्फ़ नीति नहीं, नैतिकता है; और आगमन सिर्फ़ भूगोल नहीं, मानवीय गरिमा का प्रश्न है।