
साम्प्रदायिक/राजनीतिक विभाजन की गाथा; स्त्री की स्वतंत्र आवाज़ भी गूँजती है
कमलेश्वर (1932–2007) “नई कहानी आंदोलन” के बाद हिन्दी कथा–साहित्य को नई ऊँचाइयों तक ले जाने वाले महत्त्वपूर्ण लेखक और संपादक थे। उन्होंने शहरी जीवन की दिक़्क़तों से लेकर साम्प्रदायिकता, इतिहास और राजनीति तक पर तीखी कलम चलाई।
कितने पाकिस्तान (1973, बाद में संशोधित संस्करण 2000) उनकी सबसे प्रसिद्ध और चर्चित कृति है। यह एक महागाथात्मक उपन्यास है, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन, साम्प्रदायिक हिंसा और सत्ता की राजनीति को अदालत की कार्यवाही (tribunal) के रूपक में रखा गया है।
“कितने पाकिस्तान” — यह सवाल ही उपन्यास का संदेश है: क्या केवल 1947 में ही एक पाकिस्तान बना, या हर जगह, हर समय हम जाति, धर्म, भाषा और सत्ता के नाम पर छोटे–छोटे पाकिस्तान बनाते आ रहे हैं?
• स्थान: काल्पनिक “इतिहास की अदालत” — जहाँ सारे युगों और सभ्यताओं के पात्र हाज़िर हैं।
• टोन: महाकाव्यात्मक, विचारधारात्मक, आत्ममंथनशील।
• दृष्टि: इतिहास की आलोचना और वर्तमान पर चोट।
(1) अदालत का रूपक
उपन्यास एक अदालत के रूप में गढ़ा गया है, जहाँ इतिहास के तमाम किरदार गवाही देने आते हैं—गाँधी, जिन्ना, अशोक, औरतें, आम लोग, धर्मगुरु।
(2) इतिहास की गवाही
हर युग का एक पात्र आता है और बताता है कि उसने किस तरह सत्ता, धर्म और राजनीति के नाम पर हिंसा और विभाजन देखे।
(3) स्त्री की आवाज़
इस अदालत में स्त्रियाँ भी अपनी गवाही देती हैं। वे बताती हैं कि साम्प्रदायिक दंगों और विभाजनों का सबसे बड़ा बोझ उन्होंने ही झेला—घर उजड़े, बलात्कार और विस्थापन का दर्द झेला।
(4) विभाजन का रूपक
1947 का विभाजन यहाँ सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि इतिहास की लंबी कड़ी है—जहाँ हर समय सत्ता और धर्म ने इंसानों के बीच दीवारें खड़ी कीं।
(5) अंत और निष्कर्ष
उपन्यास यह कहता है कि असली ज़िम्मेदार हमारी सामूहिक मानसिकता है, जो हर बार नये–नये “पाकिस्तान” बनाती है।
• अदालत/न्यायालय — रूपक; पूरा इतिहास यहाँ मुक़दमे में है।
• ऐतिहासिक पात्र (गाँधी, जिन्ना, अशोक आदि) — गवाह बनकर आते हैं।
• स्त्रियाँ — विस्थापन और हिंसा की सबसे सशक्त आवाज़।
• साधारण लोग — पीड़ा और असहायता के प्रतिनिधि।

• शिल्प: अदालत/ट्रिब्यूनल की संरचना; बहुस्तरीय संवाद और गवाही।
• भाषा: सीधी, व्यंग्यपूर्ण, करारी।
• प्रयोग: इतिहास और कथा को एक मंच पर खड़ा करना—कमलेश्वर की बड़ी उपलब्धि।
1. विभाजन और हिंसा — 1947 केवल एक मिसाल है; असली समस्या मानसिकता की है।
2. धर्म और सत्ता — दोनों मिलकर बार–बार इंसानों को बाँटते हैं।
3. स्त्री की स्थिति — हर विभाजन में सबसे ज्यादा बोझ स्त्रियाँ उठाती हैं।
4. इतिहास की आलोचना — इतिहास केवल विजेताओं का दस्तावेज़ नहीं; पीड़ितों की आवाज़ भी सुननी होगी।
• कितने पाकिस्तान हिन्दी का एक महाग्रंथ माना जाता है।
• इसे कई भाषाओं में अनुवाद किया गया।
• आलोचकों ने इसे “भारतीय उपमहाद्वीप की आत्मा का मुक़दमा” कहा।
• विश्वविद्यालयों में यह पुस्तक इतिहास, राजनीति और साहित्य—तीनों संदर्भों में पढ़ाई जाती है।
• कमलेश्वर ने सारिका पत्रिका के संपादक रहते हुए कई नई आवाज़ों को मंच दिया।
• वे फ़िल्म और टीवी लेखन में भी सक्रिय रहे; दूसरा कौन जैसी फ़िल्में और चंद्रकांता (टीवी सीरियल) उनके नाम से जुड़ी हैं।
• कितने पाकिस्तान को उनका सबसे बड़ा वैचारिक उपन्यास माना जाता है।
Reviewer’s Take
कितने पाकिस्तान पढ़ना सिर्फ़ उपन्यास पढ़ना नहीं है, बल्कि इतिहास की अदालत में बैठकर गवाहियों को सुनना है।
कमलेश्वर ने यह साहस दिखाया कि उन्होंने धर्म, राजनीति और इतिहास—तीनों को कठघरे में खड़ा किया। औरतों की गवाही इस उपन्यास की सबसे मार्मिक और सशक्त परत है।
एक पंक्ति में: कितने पाकिस्तान भारतीय उपमहाद्वीप की आत्मा का मुक़दमा है—जहाँ हर बार इंसानों के बीच नये–नये पाकिस्तान खड़े कर दिये जाते हैं।