परती परिकथा

मैला आँचल की छाया में कम पढ़ा गया, मगर बेहद ख़ूबसूरत उपन्यास

 

प्रस्तावना


रेणु का परती परिकथा (1957) हिन्दी के उस दौर की रचना है जब स्वतंत्रता के तुरन्त बाद गाँव-समाज नई नीतियों, नई उम्मीदों और पुराने सामन्ती ढाँचों के टूटते-बनते समीकरणों के बीच झूल रहा था। मैला आँचल (1954) की विराट लोकप्रियता और “आंचलिकता” के नये मुहावरे ने जिस पाठ परम्परा को जन्म दिया, परती परिकथा उसी लय में आगे बढ़ते हुए दूसरी, अलग तरह की धड़कन पकड़ता है—यहाँ कथा कम और समूचा परिदृश्य अधिक बोलता है: परानपुर का भूगोल, वहाँ की जातियाँ-टोले, ज़मींदारी उन्मूलन के बाद की राजनीति, सर्वे-सेटलमेंट की उधेड़बुन और बंजर (परती) धरती को हरा करने का स्वप्न। उपन्यास 21 सितम्बर 1957 को राजकमल से आया; प्रायः इसे रेणु का “दूसरा आंचलिक उपन्यास” माना जाता है।

 

कथाभूमि और समय का धड़कता नक्सा


कथास्थल है उत्तर-पूर्वी बिहार का परानपुर—रेणु के शब्दों में मेरीगंज (यानी मैला आँचल का गाँव) से बड़ा और “उन्नत” गाँव: यहाँ तेरह टोले हैं, आबादी सात-आठ हज़ार के आसपास बताई जाती है। यह मेरीगंज जितना पिछड़ा नहीं, मगर इसी “उन्नति” में नये किस्म की संकीर्णताएँ भी जन्म लेती हैं। पृष्ठभूमि ज़मींदारी उन्मूलन और उसके बाद चल रहे सर्वे–सेटलमेंट, भू-अधिकार, बँटैयादारी, आधियारी, और “काग़ज़ बनाम अरिया गवाह” की टकराहट है—एक ऐसा संक्रमण जो किसान के सपने को वैधानिक दर्जा देने का वादा करता है, पर साथ ही अफ़सरशाही, दलगत राजनीति और लालफीताशाही के कारण बार-बार उलझ जाता है।
रेणु यहाँ लोककथाओं, पुरानी जनश्रुतियों, कोसी मैया की किंवदन्तियों, धुनों और बोली-बानी के सघन संगीत से एक सम्मोहक तिलिस्म खड़ा करते हैं—जिसमें भू-दृश्य और जन-दृश्य एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। यही कारण है कि अनेक अध्येताओं ने इसे पर्यावरण-सम्बद्ध (इको-क्रिटिकल) पढ़ने का सुझाव भी दिया: “परती”—सिर्फ़ जमीन का दर्जा नहीं, अपने समय की नैतिक-आर्थिक उर्वरता/बांझपन का रूपक है।

 

कथासार (संक्षेप, पर परतदार)


कहानी एक विस्तृत ‘समूह-कथा’ की तरह चलती है; फिर भी सूत्र मिलते हैं जितेन्द्रनाथ मिश्र (कई आलोचकीय पाठ में “जितन/जित्तन” के नाम-संकेत भी) से—जमींदार घराने का वारिस, जो लंबे राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बाद गाँव लौटता है। उसके लौटने के समय ही सरकारी सर्वे-सेटलमेंट और जमीन के मौरूसी-अधिकार की बहसें उफान पर हैं; परानपुर का हर टोला, हर घर अपनी-अपनी दुर्दशा और उम्मीदों के साथ किसी फैसले की प्रतीक्षा में है। जितेन्द्र लौटकर हवेली में बैठा “हरीत क्रान्ति” का स्वप्न देखता है—पर उसे यह भी एहसास है कि कानून, राजनीति और ‘हक़ीक़त’ के बीच की दूरी खेत की मेड़ से कहीं चौड़ी है।
कहानी में कई समानान्तर धाराएँ हैं—कहीं किसान अपने “परती” को जोतने के हक़ की लड़ाई लड़ रहा है; कहीं नये-नये नेता लालच, जाति और धर्म की शपथों से जनमत तोड़-मरोड़ रहे हैं; कहीं स्त्रियाँ घर की आबरू, देह और श्रम—तीनों मोर्चों पर संघर्षरत हैं; कहीं पुराने मठ और ज़मींदारों की हवेलियों का पाखण्ड समाज के सामने निर्वस्त्र खड़ा है। रेणु घटना से ज़्यादा परिवेश का ताप लिखते हैं—परानपुर का हर चौक-चौराहा, ढाँढी-नाला, खेत-मेड़, कटही-किनारों का झाउ, और कोसी के बहाव-उरझाव... सब कथा में चरित्र बनकर जी उठते हैं।

प्रमुख पात्र: संक्षिप्त परिचय और दृष्टियाँ


•  जितेन्द्रनाथ मिश्र (उर्फ़ ‘जितन/जित्तन’): ज़मींदार घराने का उत्तराधिकारी। माता रोज़ी वुड (अंग्रेज़ मूल) और पिता कौशलेन्द्र मिश्र (तांत्रिक प्रवृत्ति वाले शाक्त ब्राह्मण) की संतान—इस ‘प्रतिलोम एंग्लो-इंडियन’ वंशावली के कारण वह परानपुर के वर्णवादी चौखटे में ‘मिसफ़िट’ है। राजनीति में अपमानित-उपेक्षित होकर गाँव लौटता है; हवेली में बैठकर सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का स्वप्न देखता है, पर समय के दोगलेपन से बार-बार टकराता है।
•  शिवेन्द्रनाथ मिश्र: जितेन्द्र के पिता की परम्परा का विमर्श—जमींदारी, तंत्र और सत्ता-खेल का धुँधलका—इसी वंश-वृत्त में उतरता है; गाँव का नैतिक-राजनीतिक अतीत जैसे इन पात्रों में जमा है।
•  लरेना ख़वास: हवेली-अमले का चतुर/क्रूर मोहरा—स्थानीय सत्ता के कारिंदों का प्रतीक, जो मालिक और प्रजा दोनों को छलना जानता है।
•  कमली: तहसीलदार विश्वनाथ प्रताप सिंह की बेटी—रेणु के यहाँ स्त्री-पात्रों की सक्रिय, संवेदनशील, और जिद्दी उपस्थिति की मिसाल; सत्ता-सम्बन्धों के बीच स्त्री-इच्छा और चयन की जद्दोजहद को वहन करती है।
•  लछमी घासिन (अब ‘मठ की कोठारिन’): धर्म-संस्था और स्त्री-श्रम का संगम-बिंदु—गरीबी, देह, दान और धर्म के ताने-बाने को रेणु जिस पारदर्शिता से लिखते हैं, लछमी उसका जीवित रूप है।
•  ताजमनी: जितेन्द्र की प्रेमिका—व्यक्तिगत प्रेम और सामुदायिक नज़रों के बीच फँसी स्त्री; गाँव के ‘मिसफ़िट’ नायक के साथ उसका रिश्ता परानपुर के नैतिकता-बोध को धकियाता रहता है।
•  परानपुर (समूह-चरित्र): तेरह टोले, सात–आठ हज़ार की आबादी, उधर बँटैयादार–आधियारी की फाइलें, इधर अरिया गवाह; कहीं मुस्लिम आबादी सिमटती, कहीं संथाल बस्तियाँ दबाई जातीं—गाँव खुद एक नायक की तरह खड़ा है।
टिप्पणी: हिन्दी विकि तथा अन्य स्रोतों में नायक-केन्द्र को लेकर भिन्न-भिन्न संकेत मिलते हैं—कहीं “जितेन्द्र/जितन” प्रमुख केन्द्र, तो कहीं ‘समूचा अंचल ही नायक’। यही दुविधा उपन्यास की शक्ति है: दृष्टि व्यक्ति से समाज की ओर शिफ़्ट होती रहती है।

 

शिल्प, भाषा और कथन-रणनीति


रेणु का ‘आंचल’ सिर्फ़ भूगोल नहीं, भाषा का स्पेस भी है—मैथिल-कोसी की ध्वनियाँ, टोले-बस्ती के मुहावरे, गीत-लोरियाँ, बूढ़े भैंसवारों की परिकथाएँ, “कोसी मैया” की वंदना… परती परिकथा में यह लोक-संगीत मैला आँचल से भी कहीं अधिक सघन होकर आता है। आलोचकों ने लिखा कि रेणु लोक-तत्वों को “छौंक” नहीं लगाते, उसका “शरबत” बना देते हैं—यानी लोक का रस कथानक में इस तरह घुला है कि अलग करना असम्भव हो जाता है।


कथन-व्यवस्था में भी रेणु ‘स्थानीय’ के बहाने ‘राष्ट्रीय’ को पढ़ते हैं: सर्वे–सेटलमेंट, भू-अधिकार, ज़मींदारी उन्मूलन—यह सब कानून की भाषा भर नहीं, चरित्रों की रगों में दौड़ता रक्त है। ग्रामीण-राजनीति की चालें—कांग्रेस बनाम सोशलिस्ट/कम्युनिस्ट प्रभाव, मुस्लिम टोले में ऐन मौके ‘शपथ’ की राजनीति, दल-बदल, अपमान-निर्वासन—ये सब ‘कथा’ नहीं, तत्कालीन उत्तर-भारत का जीवित दस्तावेज़ हैं।

 

मुख्य प्रसंग और उपन्यास की वैचारिक चौखट


1.  ज़मींदारी उन्मूलन, सर्वे–सेटलमेंट और किसान का हक़
उपन्यास के केन्द्र में ‘धरती’ का सवाल है—किसके पास और किस अधिकार से? रेणु विस्तार से बताते हैं कि किस तरह बिहार टेनेन्सी एक्ट और बाद के सर्वे–सेटलमेंट प्रयास बँटैयादारों/आधीयारों को मौरूसी हक़ का रास्ता दिखाते हैं, मगर फाइलें, घूस और ‘कागज़’—किसान की उँगलियों में लगे मिट्टी के सबूत को ‘कानूनी’ सबूत में बदलने से रोकते हैं। यह सब उपन्यास को इतिहास का समानान्तर ग्रन्थ बना देता है।
2.  “परती” का रूपक—बांझ ज़मीन से बांझ नैतिकता तक
परती सिर्फ़ बंजर खेत नहीं; वह अर्ध-नवस्वतंत्र भारत की नैतिक-पारिस्थितिकी का रूपक है—जहाँ जमीन को हरा करने के सपने के साथ समाज के भीतर भी उर्वरता/निस्सारता की बहस चलती है। यही वजह है कि इको-क्रिटिकल पठन में परती “धरती” और “समुदाय” की पारस्परिक निर्भरता का पाठ रचती है।
3.  राजनीति का छल और ‘मिसफ़िट’ नायक
जितेन्द्र का चरित्र इस विडम्बना का दर्पण है—आधा ‘गोरा’ खानदान, आधा तांत्रिक ब्राह्मण-वंश; वह न ‘जन’ में फिट होता है, न ‘शासन’ में। राजनीति उसे अविश्वसनीय मानती है; समाज उसे ‘अपना’ होने नहीं देता। यही मिसफ़िटनेस उपन्यास के नैतिक तनाव को धार देती है: क्या परिवर्तन का स्वप्न देखने वाला वर्ग/व्यक्ति सचमुच बदलने में सक्षम है?
4.  स्त्री-पात्रों की सूक्ष्म उपस्थिति
कमली, लछमी घासिन/कोठारिन और ताजमनी—ये पात्र “देह बनाम धर्म/कानून” की पुरानी बहसों में फँसी स्त्री के भीतर का इच्छाशक्ति-विवेक सामने लाते हैं। रेणु की ताकत यह है कि वे स्त्रियों को ‘प्रतीक’ नहीं, जटिल मनुष्य की तरह रचते हैं—व्यक्ति-सम्मान और सामुदायिक नैतिकता के टकराव में टिके हुए।

 

आलोचनात्मक ग्रहण और पाठ-परम्परा


समकालीनों ने परती परिकथा पर भिन्न प्रतिक्रियाएँ दीं—किसी ने मैला आँचल से भी आगे की रचना कहा, तो किसी ने उपन्यास की ‘गाथा-शक्ति’ पर आपत्ति की। प्रेमकुमार मणि जैसे आलोचकों ने बताया कि इलाहाबाद के ‘परिमल’ और प्रगतिशील धड़ों की बहसें इस ग्रहण को प्रभावित करती रहीं; रामविलास शर्मा, अमृत राय जैसे नामों के मतों का हवाला भी मिलता है। पर वस्तु-स्तर पर सब मानते हैं कि उपन्यास ने नेहरू-युग की मध्यवर्गीय मनोदशा, ग्राम-राजनीति और कानून–कचहरी वाले ‘ट्रांज़िशन’ की नस-नस पकड़ ली।


अंग्रेज़ी/हिन्दी के कई हालिया अध्ययनों ने इसे मैला आँचल की ‘छाया’ में छूट गया, पर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना—ज़मींदारी उन्मूलन/भूमि-अधिकार के संदर्भ, और कोसी-अंचल की जीवित पारिस्थितिकी के कारण। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इसे रेणु की ‘पायनियरिंग’ आंचलिक गद्य-सृष्टि का हिस्सा कहा गया है।

 

लेखक-ट्रिविया और पुस्तक-सूत्र


•  प्रकाशन/संस्करण: 1957 में राजकमल से प्रकाशन; आगे भी अनेक आवृत्तियाँ—1990 के दशक, 2001 और 2017 तक की बिब्लियोग्राफ़िक प्रविष्टियाँ उपलब्ध हैं।
•  आंचलिक उपन्यास-धारा: मैला आँचल (1954) के बाद रेणु ने इसी अंचल की दूसरी गाथा परानपुर में रची; अंग्रेज़ी/डेटाबेस स्रोत इसे ज़मींदारी उन्मूलन की पृष्ठभूमि वाले ‘मोटली ग्रुप ऑफ़ कैरेक्टर्स’ का उपन्यास बताते हैं।
•  चरित्र-सूत्र: जितेन्द्र/जितन, उसके पिता–माता (कौशलेन्द्र–रोज़ी वुड), लरेना ख़वास आदि के तंतु रेणु ने असाधारण जीवन-वृत्तों से रचे; यही ‘हाइब्रिड’ सामाजिक-वंश-गाँठ उपन्यास की नैतिक पहेली बनती है।
•  रेणु—कला और सक्रियता: 1970 में पद्मश्री; आपातकाल (1975–77) की नीतियों/दमन के विरोध में 1977 में यह सम्मान लौटाया—रेणु का यह कदम साहित्य के बाहर भी उनकी नागरिक नैतिकता का प्रमाण है। वे 1940–50 के दशक में नेपाली लोकतंत्र-आन्दोलन से भी जुड़े रहे; उनकी नेपाली क्रांति-कथा इसी अनुभव का दस्तावेज़ है।

 

सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव: ‘परती’ से वर्तमान तक


परती परिकथा ने गाँव-समाज की “नीतिगत” बहसों—भूमि-सुधार, सेटलमेंट, भू-अधिकार—को कथा के केन्द्र में रखकर हिन्दी उपन्यास को एक तरह का “दस्तावेज़ी यथार्थ” दिया। यह दस्तावेज़ीपन शुष्क नहीं; लोक-ध्वनियों, कोसी की कथाओं और परानपुर के भू-दृश्य से बना हुआ जीवित पाठ है। आज भी जब भूमि-अधिकार, विस्थापन, पुनर्वास, वन-अधिकार, भू-अधिग्रहण जैसे प्रश्न उठते हैं, परती का रूपक समकालीन लगता है—“धरती” और “समुदाय” का रिश्ता किस क़ानूनी जुगत से नहीं, किस नैतिकता और किस सहभागिता से हरा होगा? यही सवाल रेणु हमसे आज भी पूछते हैं।


साथ ही, यह उपन्यास मैला आँचल की महागाथा-छाया में दबकर कम पढ़ा गया—जबकि इसमें उत्तर-आधुनिक कहे जाने योग्य अनेक तत्व हैं: मिसफ़िट नायक, संकर (हाइब्रिड) वंश/पहचान, लोक–कानून–राजनीति का त्रिकोण, और आंचल को ‘परिदृश्य’ से आगे ‘नैतिक/पारिस्थितिकी इकाई’ की तरह देखना। इस अर्थ में परती परिकथा केवल अंचल का उपन्यास नहीं, राष्ट्र-समाज के संक्रमण का उपन्यास है।

 

पढ़ने की कला: यह किताब कैसे पढ़ें?

•  पहला चक्र: प्रारम्भिक अध्याय—परानपुर का भूगोल, लोक-गाथाएँ, कोसी-लोरियाँ—ताकि भाषा-संगीत का कान बने।
•  दूसरा चक्र: मध्यम भाग—जितेन्द्र/जितन की वापसी, सर्वे–सेटलमेंट, खेत-मेड़ और कचहरी का द्वन्द्व—जहाँ “कानून–किसान–काग़ज़” की बहस जीवित होती है।
•  अन्तिम चक्र: राजनीतिक/नैतिक निष्कर्ष—दल-बदल, अपमान, और “परती” को हरा करने का सपना; यह हिस्सा उपन्यास के रूपक को समकालीन बनाता है।

संक्षेप-निर्णय (Reviewer’s Take)


परती परिकथा उस प्रकार की पुस्तक है जिसका रस “धीमे ताप” पर खुलता है। इसमें मैला आँचल जैसी महाकाव्यात्मक विराटता नहीं—यह आपत्ति कई आलोचकों ने लिखी—पर यही इसकी विशेषता भी है: रेणु यहाँ महागाथा नहीं, समुदाय का महीन अभिलेख लिखते हैं। जितेन्द्र का ‘मिसफ़िट’ होना, लरेना ख़वास जैसे कारिंदों का उदय, कमली–लछमी–ताजमनी जैसी स्त्रियों का “नैतिक–व्यावहारिक” संघर्ष, और खेत–कचहरी–कचोट का त्रिकोण—ये सब मिलकर एक ऐसे समय का चेहरा बनाते हैं जो हमारी आज की बहसों में भी बार-बार लौट आता है।


यदि आप हिन्दी उपन्यास को सिर्फ़ “कहानी” नहीं, समाज–कानून–लोक के बहुस्तरीय इलाके की तरह पढ़ना चाहते हैं—और यह समझना चाहते हैं कि मैला आँचल के बाद रेणु ने वही अंचल किन नए सुरों में सुना—तो परती परिकथा अनिवार्य पाठ है: कम पढ़ी गई, पर उतनी ही ज़रूरी, उतनी ही चमकदार।

 

ऐन-सीधी बात:

परती परिकथा को पढ़ते समय किसी “हीरो” की तलाश न कीजिए—यहाँ नायक परानपुर है, उसकी “धरती” है, और वह नैतिकता है जिसे हरा होना है। यही इस उपन्यास का सौन्दर्य और उसकी चुनौती है।


तारीख: 31.08.2025                                    पर्णिका




रचना शेयर करिये :




नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है