आशीष तुम्हें क्या दूं माधव

 

 

आशीष तुम्हें क्या दूं माधव,

अब केवल अभिशाप बचे हैं...

 

कुरु भूमि रुधिर से रंजित है।

माता का उर भी भंजित है।

कुरुवंश भस्म है रण-तल में,

बस मरण-शोक संताप बचे हैं।

आशीष तुम्हें क्या दूं माधव,

अब केवल अभिशाप बचे हैं...

 

छिन्न-भिन्न शत वक्ष पड़े हैं।

रुधिर सने सब अस्त्र पड़े हैं।

हर नारी का क्रंदन गूंजे,

हा! अवशिष्ट विलाप बचे हैं।

आशीष तुम्हें क्या दूं माधव,

अब केवल अभिशाप बचे हैं...

 

श्री कृष्ण चाहते रुकता रण।

पर तुमने देखा मूक मरण।

कुरु कुल संहार किया तुमने,

बिन शर खंडित चाप बचे हैं।

आशीष तुम्हें क्या दूं माधव,

अब केवल अभिशाप बचे हैं...

 

यदुवंश तुम्हारा भी माधव।

देखेगा यह निर्मम तांडव।

भस्म करेंगे वही द्वारिका,

शेष यहां जो ताप बचे हैं।

आशीष तुम्हें क्या दूं माधव,

अब केवल अभिशाप बचे हैं।

 

निश्चित ही श्राप फलित होगा।

यदु वंश काल कवलित होगा।

जाकर संहार करो उनका,

उनके भी तो पाप बचे हैं।

आशीष तुम्हें क्या दूं माधव,

अब केवल अभिशाप बचे हैं...

 

- विमल शर्मा 'विमल' 

 


तारीख: 26.03.2026                                    विमल शर्मा विमल




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