बलात्कार के खिलाफ खड़े हों

कुछ लोग, अपने, जाने-अनजाने,
डालकर प्रेम का दाना,
चिड़िया को फँसा लेते हैं, 
लेकर पहचान का बहाना |

उसके पंख नोचते हैं,
ऐंठते हैं, मरोड़ देते हैं |
तन-मन को झकझोर देते हैं,
कहीं अकेले छोड़ देते हैं |

वो या तो अपने हाल पर रह जाती है,
या बहुत दूर उड़ जाती है |
या तो समाज को मोड़ देती है,
या खुद मुड़ जाती है |

पेड़ भी उसे जल्दी​ अपनाता नहीं है,
कोई पास भी अपने, बुलाता नहीं है |
आखिर कहाँ उड़े, कहाँ जाए ,
कोई भी उसे बतलाता नहीं है|

आखिर कैसे संसार में रहे,
जमाना दाना नहीं, ताना देता है |
जिंदा रहने की वजह नहीं,
उसे मरने का ठिकाना देता है |

जो खुद मजबूत होगी,
तो उठेगी, संभल जाएगी |
अन्यथा चींटियों का ग्रास बनेगी,
मिट्टी में मिलेगी, या गल जाएगी ||

                


तारीख: 18.03.2018                                                        विवेक कुमार सिंह






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